भक्त और भगवान के बीच बातचीत – भाग 1

भक्त और भगवान के बीच बातचीत निम्न विषयों पर हो रही है :

  • कामवासना क्या है
  • माया क्या है
  • विचार क्या है
  • आकर्षण का सिद्धांत क्या है

भक्त : हे सर्व शक्तिमान आप मुझे विस्तार से यह समझाए की यह कामवासना क्या होती है.  और इससे पृथ्वी पर जो पीड़ित मनुष्य है वह कैसे हमेशा के लिए मुक्त हो सकता है ?

भगवान : वत्स मै तुम्हे कामवासना से पहले थोड़ा मेरे बारे में अवगत कराता हु .

  • मैं निराकार हु
  • मैं अंतर्यामी हु
  • मैं सर्वव्यापी हु
  • केवल मेरा ही अस्तित्व है

भगवान के गुण

  • मेरा हर एक गुण अनंत है
  • अनंत गुणों मेसे मेरा एक गुण एक से अनेक होने का है
  • इसी गुण के माध्यम से मैंने सृष्टि की उत्पत्ति की है
  • मैं और यह जो संसार आप देख रहे हो 2  नहीं है
  • सम्पूर्ण सृष्टि मेरा ही स्वरुप है
  • मैंने मेरी एक शक्ति का प्रयोग करके इस सृष्टि को जन्म दिया है
  • इस शक्ति का नाम ‘काम’ है
  • अर्थात इस सृष्टि की उत्पत्ति कामशक्ति से हुयी है

 

भक्त : हे परमात्मा , मुझे तो आप पहले कामवासना के बारे में बताइये . मुझे इसके बारे में ठीक से जानना है .

भगवान : ध्यैर्य रखो वत्स .

भक्त : जी भगवान

दोस्तों सुनो अब भगवान क्या जवाब दे रहे है

  1. मैंने मेरी शक्ति का प्रयोग करके माया को प्रकट किया है
  2. जैसे समुद्र में लहरे  प्रकट होती है और फिर कुछ समय बाद वापस समुद्र में मिल जाती है
  3. मनुष्य उन लहरों को  देखकर बहुत प्रसन्न होता है
  4. तो यहां मनुष्य को एक विषय मिल गया लहरों को देखने का
  5. ठीक इसी प्रकार मै मेरे हर स्वरुप से अनन्य प्रेम करता हु 
  6. मानव , पशु -पक्षी , कीट पतंग , बैक्टीरिया , वायरस  मेरे ही स्वरुप है
  7. हर स्वरुप मेरे से मिलने को बहुत आतुर रहता है
  8. जैसे समुद्र से लहर, परमात्मा से आत्मा , माँ से शिशु , प्रेमी  से प्रेमिका  इत्यादि

देखों अब ये भक्त भगवान से क्या पूछ रहा है

भक्त : हे अंतर्यामी इसका मतलब तो यह हुआ की जिस माया को आप ने प्रकट किया है वो भी आप से मिलने को बहुत आतुर है ?

भगवान: ठीक समझा तुमने वत्स . मेने जिस माया को प्रकट किया है वह वापस मुझसे मिलने को बहुत आतुर है . यदि यह माया वापस मुझमे मिल जाती है तो इसका मतलब यह हुआ की जो में सृष्टि उत्पन्न करके मेरी माया के माध्यम से जो लीला रचता वह उद्देश्य  मेरा पूरा नहीं हुआ . इसलिए माया का अस्तित्व बना रहे मुझे माया को कोई काम देना जरुरी था . जैसे  बिना उद्देश्य के कोई भी मनुष्य  ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह सकता .

इसलिए हर मनुष्य के लिए मै कोई ना कोई उद्देश्य अवश्य  निर्धारित करता हु . वह मेरी महिमा का अभ्यास करके (अपने अंतर में झांककर ) अपने उद्देश्य का पता कर सकता है . नहीं तो वह इस संसार में सदा ही भटकता ही रहेगा . इसलिए मेने मेरी माया से मन और बुध्दि को प्रकट किया है .

अर्थात मन और बुध्दि का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है . यह दोनों ही अज्ञान है केवल में ही ज्ञान हु . मन माया है इसको मेने ऐसा बनाया है की यदि इसे  एक क्षण भी कोई काम नहीं मिलता है तो यह अपनी माया की शक्ति से कई उपद्रव मचा सकता है.  या फिर मेरे में मिल सकता है .

इसलिए मन का अस्तित्व बना रहे मेने इन्द्रियों को प्रकट किया है .

अब भगवान भक्त को इन्द्रियों के बारे में समझा रहे है

भक्त और भगवान आपस में बात कर रहे है . जैसे मै मनुष्य की बात करता हु तो मनुष्य के मन के लिए इन्द्रिया है आँख , कान , जीभ , त्वचा , नाक . अर्थात मै स्वयं रचनाकार बनकर मेने इस मनुष्य शरीर की रचना की है . अब क्यों की मुझे इस मनुष्य शरीर का अस्तित्व बनाये रखना है इसलिए मैंने इसके भोग के लिए(अर्थात शरीर के माध्यम से किये जाने वाले भोग) विषयों को प्रकट किया है .

भक्त : हे अंतर्ज्योति, ये विषय क्या है ?

भगवान : वत्स मुझे बहुत प्रसन्नता है की तुम बहुत ही रूचि के साथ समझ रहे हो . मुझे पूर्ण विश्वास है की तुम कामवासना को पूरी तरह अनुभव के साथ समझ जाओगे .

भक्त : जी भगवान

भगवान : जैसे आँख के विषय है भोजन को देखना , पानी को देखना , रास्ते को देखना , इस संसार को देखना .  ठीक उसी प्रकार कान के विषय है किसी आवाज को सुनना , संगीत सुनना इत्यादि . इसलिए मैंने मनुष्य शरीर के भोग के लिए इस संसार को प्रकट किया है.

 

भक्त : फिर बुध्दि को क्यों प्रकट किये मेरे भगवन ?

भगवान : वत्स धीरज रखो सब विस्तार से समझाता हु . मन को मेने अँधा बनाया है . मन जीभ के माध्यम से कोई भी भोजन शरीर को ना खिला दे कही इस शरीर के अस्तित्व को खतरा हो जाये . इसलिए मेने बुध्दि को प्रकट किया है.

बुध्दि यह पता करती है की कोनसा भोजन इस शरीर के लिए उपयुक्त है ताकि इस शरीर का निरन्तर विकास होता रहे . इसमें कोई बीमारी ना आ जाये . मन को तरह तरह के व्यंजन लुभा सकते है . मन सही गलत की तुलना नहीं कर सकता है . यह कार्य बुध्दि का है . बुध्दि बिना तुलना के कार्य नहीं कर सकती है .

भक्त : हे परमात्मा , मुझे आप यह समझाए की आप ने अभी थोड़ी देर पहले कहा था की मन और बुध्दि दोनों अंधे है . दोनों ही अज्ञान है फिर बुध्दि सही गलत की पहचान कैसे कर सकती है ?

भगवान: मेरे प्रिये बच्चे मुझे ख़ुशी है की आप बहुत ही ध्यान से मेरी बातों को सुन रहे हो . जब मै कोई विचार प्रकट करता हु तो मेरी ही एक शक्ति है जिसे सुरक्षा की शक्ति कहते है संसार में इसे कई नामों से जाना जाता है . उनमे से एक नाम विष्णु शक्ति भी है .

अर्थात विष्णु शक्ति जो मेरे माध्यम से प्रकट किये गए विचार की सुरक्षा करती है . जब मै मन के माध्यम से इस विचार की बार बार पुनरावृति करता हूँ तो यह विचार घनीभूत होने लगता है अर्थात दृश्य स्वरुप लेने लगता है . या किसी भी अहसास के रूप में अनुभव होने लगता है .

विचार एक प्रकार की ऊर्जा है . और जब मन इसका बार बार कम्पन करता है तो यह धीरे धीरे ठोस रूप में बदलने लगता है . या किसी और अहसास में . यह कम्पन की तीव्रता और विचार किस प्रवृति का है या क्या विचार है इस पर निर्भर करता है.  यहां भक्त और भगवान की लीला को समझाया जा रहा है .

अर्थात यह विचार ऊर्जा द्रव्यमान में बदल जाती है . जिसे विज्ञानं की भाषा में e =mc2 से भी जाना जाता है .

विचार का मन और बुध्दि से क्या सम्बन्ध है भगवन ?

भक्त और भगवान मन में उठने वाले विचारों के बारे में क्या बात करते है ?

भगवान : वत्स मेने मन में कई तल बनाये है . जैसे ही मन कोई एक विचार प्रकट करता है वह मन के एक तल पर जाकर जमा हो जाता है . और मन जब इस विचार की लगातार पुनरावृति करता है तो ये सभी विचार मन के इस तल पर जमा होते होते दृश्य रूप लेने लगते है .

जैसे मेरे मन में एक विचार आया की मुझे अहिंसा का जीवन जीना है . और अब मेरा मन बार बार इसकी पुनरावृति कर रहा है तो मेरे मन के माध्यम से जिस शरीर की रचना हुयी है उसके जो अंग है उनमे परिवर्तन होना शुरू हो जायेगा . और यह परिवर्तन शिव की शक्ति के माध्यम से होता है .

जैसे मन में एक विचार आया तो केवल वह विचार ही मन में एक तल पर जमा नहीं होता है बल्कि उस विचार को विष्णु शक्ति के माध्यम से सुरक्षित रखने के लिए मुझे विचार के पोषण के लिए विषय रुपी गुण प्रकट करना पड़ता है .

इसे वत्स मै आप को इस उदाहरण से समझाता हूँ :

जैसे मन में अहिंसा का विचार आया और मन के एक तल पर सुरक्षित हो गया . पर यह ज्यादा देर तक अस्तित्व में नहीं रहेगा यदि इसे पोषण नहीं मिला तो . इसलिए मेने मन से कहा की अब आप दूसरा विचार प्रकट करो की मै जीभ के माध्यम से किसी भी जीव को मारकर उसको खाने के स्वाद का अनुभव नहीं करूँगा . अर्थात मेरी किसी भी जीव को मारकर खाने में कोई रूचि नहीं है . ठीक इसी प्रकार ऐसी वाणी नहीं बोलूंगा जिससे हिंसा हो . इस प्रकार मन में सभी इन्द्रियों के लिए अहिंसा के विचार उनके विषयों के अनुरूप प्रकट होते जायेंगे .

भक्त : हे परमात्मा फिर बुध्दि क्या करेगी ?

भगवान : बताता हूँ वत्स . इन विचारों की निगरानी करने के लिए मै बुध्दि को आदेश दूंगा की जो क्रम मेने मन के माध्यम से प्रकट होने वाले विचारों के लिए तय किया है मन ठीक से उनका पालन कर रहा है या नहीं .

इसलिए बुध्दि के अंदर भी मैंने कई तल बनाये है . बुध्दि को मैंने मन का नियंत्रक बनाया है . और बुध्दि का नियंत्रक मै खुद हूँ . पर मन का मुख्य नियंत्रक मै खुद हूँ . अर्थात मन को मै कोई आदेश देदू और और बुध्दि के हिसाब से वह  गलत है फिर भी मन से वह काम में करवा लेता हूँ .

क्यों की मेने बुध्दि को केवल माया का अस्तित्व बना रहे इसके दायरे में होने वाले  कर्मो का नियंत्रण ही दिया है . कोई मनुष्य मुझे बुध्दि से जाननें का प्रयत्न करे तो यह बुध्दि के बस की बात नहीं है . क्यों की वास्तविकता में बुध्दि का कोई अस्तित्व नहीं है . मुझे मन से , बुध्दि से नहीं जाना जा सकता है . क्यों की यह दोनों ही माया है .  अब आगे आगे देखिये भक्त और भगवान में क्या क्या बाते होती है.

देखों दोस्तों यह भक्त माया में कैसे फस रहा है

भक्त : हे मायाचारी फिर तो आप मन से कुछ भी अनैतिक कार्य करवा सकते हो . और आप ने पहले कहा की बुध्दि सोच समझकर निर्णय लेती है,  की मनुष्य के हित में क्या है .

भगवान: नहीं वत्स , ऐसा नहीं है . मेरी माया भी मेरे सत्य नियम के तहत ही लीला करती है . अर्थात अकारण इस सृष्टि में कुछ भी नहीं होता है .

अर्थात यदि किसी मनुष्य ने किसी भी जीव को कष्ट पहुंचाया है तो मेरी माया उसको सजा अवश्य देती है. मेरी माया में अन्याय नहीं होता है बल्कि मनुष्य जैसा कर्म करता है उसको वैसा ही फल मिलता है .

भक्त : हे परमात्मा मै समझा नहीं

भगवान : वत्स मै आप को अब और गहराई में ले चलता हु . सबसे पहले मै मेरे निराकार स्वरुप से एक ऊर्जा कण लेकर उसका जीवन चक्र शुरू करता हु . इस ऊर्जा कण को आप विचार की संज्ञा दे सकते हो . अर्थात परमाणु से सूक्ष्म उसमे उपस्थित इलेक्ट्रान प्रोटोन उनसे भी सूक्ष्म होता है एक विचार .

भक्त और भगवान की बातचीत के ये अंश और भी ज्यादा महत्वपूर्ण है:

वत्स परमाणु का भी कोई अस्तित्व नहीं है और इलेक्ट्रान प्रोटोन का भी कोई अलग से अस्तित्व नहीं है .

  • ये सब अविध्या
  • अज्ञान है
  • आज तक परमाणु को किसी ने नहीं देखा
  • केवल मेरा ही अस्तित्व है बाकी सब माया है
  • झूट है , छल है , मिथ्या है , नश्वर है , भंगुर है
  • प्रतिक्षण बदल रहे है
  • केवल मै अकेला अपरिवर्तनशील हु

धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

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