मेरे प्रिये साथियो मै आप को आज उस सच से रूबरू करवाऊंगा जिसको यदि आप ने समझ लिया तो मोटापे का यह रोग हमेशा हमेशा के लिए दूर हो जायेगा और आपका शरीर एकदम सूंदर , सुडौल और अपने अनिवार्य वजन में रूपांतरित हो जायेगा . दूसरा मै आप को इस लेख में वह विधि भी बताऊंगा जिसको पूरी ईमानदारी से अपना कर आप 100 % मोटापे को जड़ से दूर कर देंगे . मेरे प्रिये साधको जब हम अपने आप को शरीर मानते है और मोटा पतला कहते है तो जो हमे प्राण शक्ति मिलती है वह बाधित होती है और हमारी कभी भी ठीक से रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं बढ़ पाती है . पर सच बात यह है की हम ऐसा कहते क्यों है . ऐसा हम पुराने संचित कर्मो के कारण कहते है . या तो पूर्व जन्म में हमने ऐसा आचरण किया है जिसमे हमने खूब खा खाकर हमने अपने आप को इतना मोटा कर लिया था की उस समय के सब लोग हमारे को मोटा कहकर पुकारते थे या इस जन्म में या फिर किसी अन्य जन्म में . अर्थात कुल मिलाकर हमने ऐसी चेतना को मूर्त रूप दे दिया था जिससे अब हम ऊब चुके है और इस पुरानी चेतना से हम मुक्ति चाहते है . जब तक हम इस मोटापे वाली चेतना से मुक्त नहीं होंगे तब तक चाहे आप भूखे रहने लग जाओ, कैसा भी इलाज करा लो , आप का वजन कम नहीं होगा . क्यों की भोजन तो हम एक बार खाते है पर हमारा मन इस क्रिया को दिन में हज़ारो बार दोहराता है . अर्थात मन जिस क्रिया को एक बार कर लेता है उसको वह बार बार करना चाहता है यदि उसका बीज पहले से अवचेतन मन में बहुत ही बलवान होकर बैठा है तो . तो फिर प्रश्न यह उठता है की जैसे हमारे अवचेतन मन में मोटापे का प्रारब्स बीज जमा है और हम रोज खाना खाकर उसको पोषित कर रहे है तो फिर तो हम इस मोटापे की चेतना से कभी मुक्त ही नहीं होंगे . ऐसा नहीं है . जब हम सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्र होकर मन की पूरी शक्ति , बुद्धि की पूरी शक्ति , भावना की पूरी शक्ति , विवेक की पूरी शक्ति , सभी इन्द्रियों की पूरी शक्ति लगाकर ध्यान करते है तो हमारे भीतर द्रष्टद्युम की शक्ति प्रकट होती है अर्थात हमे एक ऐसी शक्ति का अनुभव होता है जो हमे बहुत अच्छी लगती है और इस शक्ति से आगे फिर दो शक्तियाँ प्रकट होती है पहली द्रुपद चेतना और दूसरी द्रोपदी चेतना . यह शक्तियाँ परमात्मा के ही विभिन्न चैतन्य रूप है . या इन्हे हम दिव्य शक्तियाँ भी कह सकते है . इनका नामकरण परमात्मा इनको जो कार्य सोपते है उसके आधार पर होता है . द्रुपद चेतना इस शरीर को उस रूप में परिवर्तित कर देती है जिसमे इसे होना चाहिए अर्थात इसका सही वजन कितना होना चाहिए . पर यदि साधक खुद कितना वजन कम करना चाहता है तो फिर साधक को चाहिए की जब वह गहरे ध्यान में उतरे तो उस समय हमारा चेतन मन सो जाता है और अवचेतन का रास्ता खुल जाता है . अब इसमें साधक अपनी कल्पना शक्ति का प्रयोग करके जितना वजन चाहता है उसको महसूस करना है . बार बार महसूस करने का यह विचार साधक के अवचेतन मन में चला जाता है और मोटापे के बीज का स्थान ले लेता है . अर्थात अब मोटापे की चेतना से मुक्ति मिल जाती है . यह कार्य एक अभ्यास में नहीं हो सकता है . क्यों की यह निर्भर करता है साधक के अवचेतन मन में मोटापे के बीज कितनी मात्रा में जमा है और एक साथ इनके रूपांतरण से होने वाले परिवर्तन साधक सहन नहीं कर पाता है. पर यहां ध्यान देने योग्य बात यह है की साधक दोनों मेसे कोई एक तरीका ही पुरे अभ्यास काल में अपना सकता है . अर्थात या तो साधक द्रष्टद्युम चेतना में जिए और जो शरीर का अनिवार्य वजन हो उसको स्वीकार करे या फिर खुद की विचार शक्ति से जितने वजन का होना चाहता है उस विधि का अभ्यास करे . केवल इस अभ्यास से ही पूरा काम नहीं होगा . साधक को अपने भोजन पर भी विचार करना बहुत जरुरी है . क्यों की यदि साधक ज्यादा फैट वाली चीजों का अभी भी ज्यादा मात्रा में लगातार सेवन कर रहा है तो इसका मतलब यह हुआ की वजन बढ़ाने वाली चेतनाये वह अपनी आत्मा में जोड़ता जा रहा है और अभ्यास से वजन बढ़ाने वाली चेतनाओं को रूपांतरित करता जा रहा है . इससे साधक का मन असमंजस की स्थिति में चला जाता है और यह साधना सही तरीके से लाभ नहीं पंहुचा पाती है . यह ऐसे ही है जैसे हम बीमारी के इलाज के लिए दवा लेते रहे और बीमारी की जड़ को खाद पानी देते रहे . तो बीमारी ऊपर से कटती रहेगी और नीचे से बीमारी की जड़े फूटती रहेगी . मोटापे से ग्रसित साधक को अपने मन को इस प्रकार ट्रेंड (तैयार) करना है की जब उसको समाज में या घर परिवार में कही भी मोटा कहे तो साधक पहले उस शब्द को सुने और अपने मन को आदेश दे की इन्होने मुझे संतुलित वजन वाला व्यक्ति बोला है . यह तभी संभव होगा जब साधक परमात्मा की महिमा का अभ्यास निरंतर करेगा . मन को आदेश देने के बाद साधक इन लोगो को या तो धन्यवाद दे या मुस्कराये और महसूस करे की मेरा वजन जो मै चाहता था वह मुझे मिल गया है . जब साधक की तरफ से इस प्रकार की प्रतिक्रियाएं जाएगी तो इसका अर्थ यही तो है की मोटापे की पुरानी चेतनाओं से मुक्ति मिल रही है . जो यह लोग आप को मोटा कहकर पुकारते है, यह लोग ही तो आप के अवचेतन मन में जमा मोटापे की चेतनाये है जो इन लोगो के रूप में प्रकट हो रही है . ऐसे साधक ऐसे कपड़े पहने जिसमे उनको मोटापा कम महसूस हो , ऐसे व्यायाम करे ,ऐसे चले , ऐसे खाये , ऐसे पिए , ऐसे सोये , ऐसे बोले , ऐसे सोचे , ऐसे देखे , ऐसे सुने , ऐसे सूंघे , ऐसे स्पर्श करे जिससे मोटापा आप कम महसूस कर पाए . ऐसे वातावरण में रहे जहा आप को ऐसे लोग मिले जो आप को आप के ज्ञान से जाने ना की आप की शारीरिक बनावट से . इन सब उपायों में समय लगता है , आप के धैर्य की परीक्षा होती है . अनवांछित चेतनाओं से मुक्ति और उच्च चेतनाओं की तरफ बढ़ना ही तो भक्ति है . आप जब रात दिन अपने आप को सही वजन का महसूस करेंगे तो आप को पता भी नहीं चलेगा की आप कब सही वजन में आ गए . साधक को दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है . बस एक बार ठानना है . ऐसी गलती मत करना की २ दिन अभ्यास करे और अपना वजन चेक करने लग जाए . इसका मतलब अभी आप को अपने महसूस करने पर विश्वास नहीं हुआ है . आप को भोजन इतना करना है की जैसे जैसे खाना खाते हुए स्वाद की अनुभूति कम होने लग जाए भोजन करने की क्रिया रोक दे . अर्थात हमेशा भूखा रहे , भूख को ख़त्म ना करे , इसी प्रकार पानी पिए . परमात्मा की महिमा के अभ्यास की शर्त ही यह है की इस अभ्यास के लिए 100 % अहिंसा के नियम का पालन करना होता है . पूरा पेट भर के खाना खाने का मतलब है की हमने भूख को मार दिया है . जब आप गहरा अभ्यास करते है और कूटस्थ में मन को लाने में कामयाब हो जाते है और सुषुम्ना में मन को गमन करा सकते है तब आप एक क्षण में मोटे और पतले हो सकते है . क्यों की उस अवस्था में आप एक ऐसी शक्ति के साथ होते है जिसे जिस भी विचार पर लगाते है वह तुरंत फलीभूत हो जाता है . पर यह थोड़ा कठीन होता है . इसलिए आप धीरे धीरे अपने शरीर को रूपांतरित कर सकते है . जिससे आप को अभ्यास से बोरियत नहीं होती है और तनाव पैदा नहीं होता है . क्यों की गृहस्थ साधक के लिए यह दूसरा तरीका ज्यादा अनुकूल होता है . चाहे आप का मोटापा किसी बीमारी के कारण से हो या किसी अन्य कारण से यह विधि काम करती ही करती है . क्यों की यह विधि D N A को बदलने की क्षमता रखती है . धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
केवल परमात्मा का अस्तित्व है. परमात्मा सर्वव्यापी है परमात्मा कण कण में विराजमान है. परमात्मा का हर गुण अनंत है जैसे परमात्मा का एक गुण यह भी है की वे एक से अनेक रूपों में प्रकट होते है. निराकार से साकार रूप में प्रकट होना है : सृष्टि की उत्पति अर्थात निराकार से साकार रूप में प्रकट होना ,असंख्य जीव अर्थात एक से अनेक होने का गुण. मानव का लक्ष्य केवल परमात्मा को जानना है , खुद के स्वरूप को जानना है , परमात्मा और हमारे बीच दूरी शून्य है इसका अनुभव करना है , हर पल खुश कैसे रहे इसका अभ्यास करना है
Friday, May 31, 2024
Thursday, May 30, 2024
दिव्य शक्तियाँ हमारी मदद कैसे करती है ?
मेरे प्रिये साथियो मै आज अपने परम पिता परमेश्वर का वह राज बताने जा रहा हु जिस पर यदि आप ने विश्वास कर लिया तो आप अपने जीवन में आगे होने वाले बड़े नुकसानों से 100 % बच जायेंगे . जब हमारे किसी प्रारब्ध अर्थात पुराने संचित कर्म के कारण कोई नुकसान भविष्य में होने वाला है तो आप परमात्मा की महिमा का अभ्यास करके उस नुकसान से बच जायेंगे . कैसे ? . इसे हम एक उदाहरण से समझते है . जब कोई व्यक्ति हमारे पास पैसे उधार लेने आता है तो हम सबसे पहले यह सोचते है की यह समय पर वापस देगा या नहीं . ऐसा हम थोड़ा उस व्यक्ति पर गौर (ध्यान करना ) करने के कारण सोच पाते है . उस व्यक्ति पर गौर हम परमात्मा की शक्ति के माध्यम से कर पाते है और गौर करने का कारण हम पैसे से बहुत प्रेम करते है . इसलिए सोचते है की कही मेरी मेहनत का पैसा नहीं चला जाये . अर्थात जब हम किसी चीज से बहुत प्रेम करते है तो हम हमारे परमात्मा को यही कह रहे होते है की हे परम पिता मेरी यह चीज कोई भी नहीं लेकर जाए . और यह बात हम दिल से महसूस भी करते है . जब कोई इच्छा हम दिल से महसूस करते है तो हमारे परम पिता हमारी पुकार को तुरंत सुन लेते है और हमारी मदद के लिए किसी न किसी रूप में वे खुद आते है . अब चाहे आप इन्हे दिव्य शक्तियाँ कहो या साधारण जीव . तो जैसे ही उस व्यक्ति को उधार देने में हम पहला संकोच करते है तभी हमारे सबसे ज्यादा हितेषी अर्थात घर वाले या मित्र या कोई रिश्तेदार कहते है की इस व्यक्ति को उधार पैसे मत दे देना यह वापस नहीं लौटाएगा . यह जो हितेषी बनकर आया है वे खुद परमात्मा ही होते है . पर हम इन हितेषियों की बात इसलिए नहीं मानते है की हमारा पुराना संचित कर्म इतना बलवान होता है की हमारी बुध्दि और विवेक को खा जाता है क्यों की अभी हम ज्यादा ध्यान का अभ्यास नहीं कर रहे होते है . अर्थात अभी हम परम पिता से गहरे रूप से नहीं जुड़े है . और यदि हम ध्यान में गहरे उतरे होते तो जो हितेषी हमारे को उस व्यक्ति को पैसे देने से मना कर रहा है हम उसकी बात पर गहराई से चिंतन करते . क्यों की गहरा ध्यान करने वाला व्यक्ति हर किसी की बात को बहुत ही ध्यान से सुनता है समझता है और परखता है फिर निर्णय पर पहुँचता है . और सामान्य व्यक्ति चीजों को बहुत ही हलके में लेता है इसलिए नुकसान उठाता रहता है क्यों की वह ज्यादातर यंत्रवत चलता है अर्थात प्रारब्ध ही भोग रहा होता है . जब हम गहरा ध्यान करते है तो हमारे को परम पिता से एक ऐसी टोर्च मिल जाती है जिसको उधार मांगने वाले व्यक्ति की तरफ करते है तो इस टोर्च की रौशनी में उसकी सच्चाई का पता चल जाता है की यह पैसे वापस देगा या नहीं . अर्थात यह व्यक्ति झूठ बोल रहा है या सच . इसलिए हमे निरंतर परमात्मा की महिमा का अभ्यास करना बहुत ही अनिवार्य है . ठीक इसी प्रकार जब हम रोड़ पर गाडी चला रहे है या कही ऐसी जगह फस गए है जहा सामान्य व्यक्ति हमारी मदद के लिए नहीं आ सकता है . तब परमात्मा दिव्य शक्ति के रूप में आकर हमारी मदद करते है . जैसे हम किसी दुर्घटना में बाल बाल बच जाते है . यह मदद दिव्य शक्ति करती है . परमात्मा खुद निराकार है और सर्वव्यापी है इसलिए उनकी शक्ति इतनी ज्यादा तीव्र है की वे बड़े रूप में नहीं आ सकते . आ जाये तो हमारा शरीर उनके तेज प्रकाश की आग में जलकर राख हो जाए . इसलिए वे किसी दिव्य शक्ति या सामान्य व्यक्ति या किसी अन्य जीव या किसी अन्य भौतिक पदार्थ के रूप में ही आते है . जब हम परमात्मा की महिमा का अभ्यास अर्थात सिर से पाँव तक में एकाग्र होकर गहरा ध्यान करते हुए जीवन की सभी क्रियाये करते है और मन में यह गीत लगातार बजता रहे की यह सब मै नहीं मेरे पिता इस शरीर रचना के रूप में कर रहे है और संचित कर्मो के बीजो पर जब परमात्मा का प्रकाश गिरता है तो यह संचित बीज धीरे धीरे नष्ट होने लगते है और जिस भाव में हम उस क्षण होते है उसमे यह बीज रूपांतरित होते जाते है . जैसे हम पेट में दर्द से परेशान है और इसका इलाज करा करा के थक गए है फिर भी पेट दर्द दूर नहीं हो रहा है . तो फिर परमात्मा की महिमा का अभ्यास ही एक मात्र इसका जड़ से इलाज करने वाला उपाय है . जब हम यह अभ्यास करते है तो अभ्यास के दौरान हम मन को भूमध्य पर एकाग्र करते है , श्वास पर एकाग्र होते है , सिर के पीछे मेडुला पर एकाग्र होते है और फिर पेट में दर्द वाले स्थान पर एकाग्र होते है . कभी कभी तेज दर्द हो तो यह क्रम बदल भी सकते है . अर्थात सबसे पहले ध्यान पेट दर्द वाले स्थान पर ही जायेगा . अब दर्द वाले स्थान पर एकाग्र होकर ध्यान करते है और मन ही मन यह महसूस करते है की इस स्थान की सभी कोशिकाएं(प्रारब्ध के कारण रुग्ण बीज ) परमात्मा से प्राप्त शक्ति से ख़ुशी , विवेकशील , ताकतवर , समृद्ध , ज्ञानवान , पूर्ण स्वस्थ , उचित वजन इत्यादि में रूपांतरित हो गयी है . पर याद रखे यह कार्य तेज दर्द के कारण एक बार के अभ्यास में नहीं होगा . क्यों की विष्णु की शक्ति इन रुग्ण कोशिकाओं की रक्षा करती है और शिव की शक्ति इनको रूपांतरित करती है . पर यदि यह रूपांतरण एक ही अभ्यास में हो जाए तो यह शरीर रचना में तीव्र परिवर्तन हम सहन नहीं कर पाएंगे और हो सकता है कुछ ऐसा परिवर्तन हो जाए की हम डर जाए . क्यों की परमात्मा की शक्ति को ज्यादा मात्र में सहन करने के लिए हमारे मन में बहुत गहरा विश्वास होना चाहिए अर्थात हमारा मन किसी भी परिवर्तन से डरना नहीं चाहिए . इसलिए मै कहता हु की अभ्यास ऐसा करे जो मन को अच्छा लगे . क्यों की मन की स्वीकृति के बगैर अभ्यास करने पर सफलता नहीं मिलती है . इस अभ्यास के दौरान जब हम शंकाओ से घिर जाते है और अपने परम पिता को पुकारते है तो वे या तो सपने में या किसी दिव्य शक्ति के अहसास के रूप में या किसी अन्य रूप में आकर हमारा मार्गदर्शन करते है की आप यह गलती कर रहे है और इसको इस तरीके से ठीक करना है . यह हमारी आत्मा की आवाज ही होती है . आत्मा और परमात्मा दोनों एक ही है . आत्मा को निर्देश परमात्मा से ही मिलते है . आत्मा का पिता है परमात्मा . कण कण में केवल परमात्मा का ही अस्तित्व है . पर माया की शक्ति के कारण हम यह अनुभव नहीं कर पाते है . धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
इस विज्ञानं को समझे परमात्मा हमारा सुरक्षा कवच कैसे है ?
Wednesday, May 29, 2024
भयंकर दर्द में भी हँसे कैसे ? | परमात्मा की महिमा - भाग 4
इसलिए आप को जरुरत है परमात्मा की महिमा के अभ्यास की तरफ पहला कदम उठाने की . जब आप शुद्ध अंतकरण से पहला कदम उठा लेंगे (शिव की शक्ति का प्रयोग करके) तो विष्णु की शक्ति आप के इस पहले कदम को अवचेतन मन में जमा कर देगी और फिर दूसरा कदम(परिवर्तन के लिए अर्थात आप को नयी आदतों की सीढ़ी बनाने के लिए) उठाने के लिए आप फिर से शिव की शक्ति का प्रयोग करेंगे . यह शिव की शक्ति जब आप जब भूमध्य पर एकाग्र होकर भूमध्य पर ध्यान करेंगे तो आप को मिलने लगेगी और फिर धीरे धीरे शरीर में हर हिस्से में एकाग्र होकर उस हिस्से में ध्यान करोगे तो वहा सोयी हुयी शिव की शक्ति जगने लगेगी और आप का इससे सीधा संपर्क होने लगेगा . अर्थात आप आत्मा से जुड़ते हुए परमात्मा से जुड़ने लगेंगे और आप को अनुभव होने लगेगा की आत्मा शरीर के हर हिस्से में है और परमात्मा कण कण में है . आप को ज्ञान होगा की आत्मा और परमात्मा दोनों एक है . आप इतने समय से अपने आप को शरीर मान रहे थे इसलिए आप को यह वहम था की मै अलग हु , आत्मा अलग है , परमात्मा अलग है . पर जब परमात्मा की महिमा का अभ्यास करोगें तो पता चलेगा तीनों एक ही है बस रूप बदल रहा है . आप पहले भी थे , अभी भी हो और आगे भी रहोगे . आप अजर अमर है . आप को अनुभव होगा की ना तो जन्म होता है और ना ही मृत्यु होती है केवल निर्माण (ब्रह्मा शक्ति ), सुरक्षा (विष्णु शक्ति ), और परिवर्तन (शिव की शक्ति ) होते है . जब हम बेहोशी में जीते है तो यही हमारे लिए प्रलय कहलाती है . जिसे साधारण भाषा में कहते है की शिव ही इस सृष्टि का श्रंगार करते है अर्थात संसार प्रकट होता है ब्रह्मा शक्ति से , संसार का लालन पालन विष्णु जी करते है और संसार में परिवर्तन शंकर जी करते है . इन को भारत में ब्रह्मा , विष्णु और महेश कहते है . अर्थात ये तीनों देवता ही इस संसार को चलाते है . पर इसका मतलब यह नहीं है की यह तीनों देवता विदेशों में नहीं होते है . निर्माण का काम तो अमेरिका , रूस , जापान सभी जगह हो रहा है . जैसे अमेरिका की कंपनियों में रोज नए निर्माण हो रहे है , उनकी सुरक्षा हो रही है और जरुरत पड़ने पर आवश्यक परिवर्तन हो रहे है . ऐसा ही रूस में हो रहा है , ऐसा ही जापान में और ऐसा ही हमारे शरीर में हो रहा है . इसलिए ये तीनों देवता तो सभी जगह मौजूद है . बस बात इतनी सी है की परमात्मा की लीला के कारण संसार में विविधता को कायम रखने के लिए हमे अलग अलग भाषा के लोग मिलते है , अलग अलग क्षेत्रो के अलग अलग व्यंजन प्रसिद्द होते है , अलग अलग वेश भूषा , अलग अलग धर्म , अलग अलग सम्प्रदाय होते है . क्यों की विविधता ही संसार है . मुझे पूर्ण विश्वास है की यह छोटी सी जानकारी आप को जीवन में सही राह दिखाएगी . धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
Tuesday, May 28, 2024
भयंकर दर्द में भी हँसे कैसे ? | परमात्मा की महिमा - भाग 3
अर्थात ज्ञानी साधक तीव्र परिवर्तनों को बड़ी ही समझदारी से धीरे धीरे सहन करके उनको अपने अवचेतन मन से विदा कर देता है और नयी आदतों के बीज अवचेतन मन में डालता जाता है और इन नयी अच्छी आदतों के लालन पालन के लिए उचित वातावरण उपलब्ध कराता है . जैसे हम दर्द महसूस करने की आदत को ख़ुशी महसूस करने की आदत में रूपांतरित करना चाहते है तो हम ऊपर बताई गयी विधि अपनाकर हम वे सभी काम करेंगे जिनको करने के दौरान हम दर्द को भूल जायेंगे . जैसे हम कोई हमारा बहुत ही पसंदिता संगीत , भजन , गाना सुनेंगे या पार्क में खेलेंगे , कोई अच्छी चीज खाएंगे , या कोई अच्छी किताब पढ़ेंगे, या कोई पिक्चर देखेंगे , या मंदिर -मस्जिद -गुरुद्वारा -चर्च जायेंगे , या कही घूमने जायेंगे , या किसी दोस्त से मिलेंगे, या कोई दर्द का इलाज लेंगे इत्यादि . परमात्मा की महिमा का अभ्यास एक मात्र ऐसा अभ्यास है जिसको पूर्ण रूप से करने पर आप 48 डिग्री तापमान में भी काम करते हुए ठण्ड का अनुभव करेंगे और भयंकर ठण्ड में भी आप गर्मी का अनुभव करंगे . अर्थात आप पूर्ण अभ्यास पर मौसम से अप्रभावित रहने लग जायेंगे . पर इस अवस्था मै यदि आप परमात्मा से सीधा सम्बन्ध होने के कारण आप को जो शक्ति मिलती है उसका यदि प्रकृति के विरुद्ध जाकर इस्तेमाल करते है तो फिर परमात्मा आप से यह शक्ति वापस ले लेते है . क्यों की परमात्मा को प्रकृति का संतुलन बनाये रखना बहुत जरुरी है . इसीलिए तो पृथ्वी पर मनुष्य जब अपने विचारों में दूरी बना लेता है और अनुभव करता है की मै अलग हु , हवा अलग है , पृथ्वी अलग है , अग्नि अलग है पेड़ पौधे अलग है , दूसरे व्यक्ति अलग है , जीव जंतु अलग है और ऐसा अनुभव करके अनैतिक कार्य करने लगता है तो परमात्मा प्रकृति के माध्यम से एकता का अनुभव कराने के लिए ऐसे मनुष्य के जीवन में भयंकर आंधी तूफ़ान , सुनामी , भूकंप इत्यादि को लाते है और इससे ऐसे मनुष्य को पूर्ण रूप से यह अहसास हो जाता है की हम प्रकृति से किसी न किसी रूप में अवश्य जुड़े है . मनुष्य के जीवन में हर एक घटना के पीछे एक सच्चा कारण होता है . इसलिए यदि आप दर्द मे भी हँसना चाहते है तो फिर परमात्मा की महिमा का अभ्यास करे अर्थात भूमध्य साधना करे , सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्र होने का अभ्यास करे , कूटस्थ पर ध्यान केंद्रित करे , सुषुम्ना में उतरे , हर काम करते हुए अपने शरीर को याद रखे , पैर कहा है , सिर कहा है , हाथ कहा है , कमर कहा है , पीठ कहा है , पेट कहा है , जाँघे कहा है , पिण्डलिया कहा है , श्वास कहा तक चल रही है , शरीर में क्या क्या परिवर्तन हो रहे है , दर्द कहा हो रहा है , खुजली कहा हो रही है , सुन्नपन कहा है , नशे कहा फड़क रही है , खून किधर बह रहा है, आप क्या सुन रहे है , आप क्या सूंघ रहे है , आप क्या देख रहे है , आप के भीतर क्या चल रहा है . यह सब करने में समय लगता है .
आगे का भाग कल
शाम 5 से पढ़े……..
गुरु किसे कहते है ?
Monday, May 27, 2024
भयंकर दर्द में भी हँसे कैसे ? | परमात्मा की महिमा - भाग 2
हम सब जानते है की हमें ख़ुशी चाहिए , सफलता चाहिए, अपने सपनों को पूरा करना है तो फिर हम इन संवेदनाओं पर एकाग्र होकर ध्यान की शक्ति का प्रयोग इस भाव के साथ करते है की हमे जो चाहिए वह मिल जाए . इसलिए यदि हमारे भयंकर दर्द हो रहा हो तो हमे उस दर्द वाले स्थान पर पहले एकाग्र होना है और फिर उस पर जो चाहिए उस भाव के साथ ध्यान की शक्ति का प्रयोग करना है . अर्थात हमे जो चाहिए उसका विचार अपने आप ही हमारे मन में आएगा और उस विचार पर ध्यान की शक्ति लगाएंगे तो वह विचार इस ध्यान की शक्ति के कारण करोड़ों बार पुनरावृत होगा अर्थात मन में वह विचार बार बार दोहराया जाएगा और फिर बार बार दोहराने के कारण वह विचार सघन रूप लेने लगेगा . यहां बहुत ही मजेदार बात यह है की जब हम अच्छा महसूस करते है तो इसका वास्तविक अर्थ क्या है ? . इसका वास्तविक अर्थ यह है की अच्छा महसूस करने का जो विचार है वही तो बार बार दोहराया जा रहा है मन के माध्यम से . तभी तो हम अच्छा महसूस कर पा रहे है . क्यों की भूमध्य पर एकाग्र होते हुए जब हम दर्द पर एकाग्र होकर ध्यान की शक्ति का प्रयोग करते है तो इच्छाशक्ति के जगने के कारण हम ख़ुशी के विचार(शुद्ध परमात्मिक चेतना ) को दर्द में भी पहली बार लाने में कामयाब हो जाते है और जैसे ही इस विचार के अस्तित्व में आने की कारण हमारे कूटस्थ में जो विष्णु की शक्ति होती है वह इस विचार की रक्षा करती है . इस ख़ुशी के विचार की रक्षा होने के कारण यह विचार अब हमारे अवचेतन मन में बीज रूप में सुरक्षित रूप से जमा हो जाता है और इसके अवचेतन मन में जाने के कारण अब हम दूसरी बार ख़ुशी को महसूस करने में पहली बार से ज्यादा आसानी का अनुभव करते है(न्यूटन की गति नियम) . क्यों की पहली बार ख़ुशी के विचार को लाने के लिए हमे एकाग्र होकर ध्यान लगाना पड़ा था जिससे हमारा चेतन मन सो गया था और हम चेतन मन के निचले तल पर पहुंचकर जो अवचेतन मन है वहा पहले से मौजूद दर्द रुपी विचार बीज को ध्यान की अग्नि से जलाकर नष्ट करके उसकी जगह ख़ुशी रुपी विचार बीज को प्रतिस्थापित कर दिया था . इसलिए जब हम गहरे ध्यान में उतरते है तो हमारा चेतन मन सो जाता है और हमारा संपर्क हमारे संचित कर्मो से होने लगता है . अब जिस व्यक्ति के संचित कर्म जैसे होंगे उसको वैसे ही तो अनुभव महसूस होंगे और उसके जीवन में वैसी ही घटनाओं का आगमन होगा . इसीलिए तो कई व्यक्तियो को ध्यान के दौरान डर लगना, झटके लगना , शरीर का कांपना , शरीर का हिलना , धूजणी छूटना , पसीना आना , चक्कर आना , सिर में दर्द होना , सिर घूमना , पुरानी बाते याद आना , पिछले जन्म की बाते याद आना ऐसे तमाम प्रकार के अनुभवों का सामना करना पड़ता है . जो साधक इन अनुभवों से डर जाता है वह ध्यान करना छोड़ देता है और अपने भाग्य के भरोसे जीवन को यंत्रवत जीता है और कहता है की समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कभी नहीं मिलता है . और जो साधक इन अनुभवों से (परिवर्तनों से ) नहीं घबराता है वह अपने आप को बदलकर ही दम लेता है . यदि वह परिवर्तनों को सहन नहीं कर पा रहा है तो ऐसा ज्ञानी साधक अपने मन और शरीर को ऐसी अवस्था में ले जाता है जो उसके मन को अच्छी लगे . और फिर जैसे ही इन परिवर्तनों का प्रभाव ख़त्म हो जाता है ऐसा ज्ञानी साधक फिर से ध्यान करना शुरू कर देता है .
आगे का भाग कल
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Sunday, May 26, 2024
भयंकर दर्द में भी हँसे कैसे ? | परमात्मा की महिमा - भाग 1
मेरे प्रिये साथियो मै आप को आज वह राज बताने जा रहा हु जब हमारे किसी बीमारी के कारण या किसी चोट के कारण या किसी तनाव के कारण या किसी पिछले कर्म फल के कारण शरीर में भयंकर दर्द हो रहा हो और हमे कई सारे काम करने बहुत जरुरी हो तब कैसे हँसे और अच्छा महसूस करे क्यों की मैंने बताया था की जो हम महसूस करते है वही हम है और वही चीज़े हम आकर्षित करते है . मैंने कुछ वीडिओज़ में यह भी बताया था की जो हम इच्छा करते है या प्रार्थना करते है वह हमे नहीं मिलता है . इसको मै अब अच्छे से समझाता हु . जब प्रार्थना शुद्ध अंतकरण से की जाती है तब वह फलित होती है . आमतौर पर जब हम प्रार्थना करते है तो प्रार्थना के अनुकूल हम महसूस नहीं करते है . जैसे प्रार्थना तो हमने सुबह करली और दिनभर हम प्रार्थना के विपरीत सोच रहे है और फिर विपरीत ही महसूस कर रहे है . तो फिर प्रार्थना कैसे फलित होगी ?. ठीक इसी प्रकार जब हम इच्छा करते है तो यदि वह भी शुद्ध अंतकरण से नहीं होगी तो कैसे फलित होगी ?. इसलिए अब बात आती है अच्छा महसूस कैसे करे जब शरीर में भयंकर दर्द हो रहा हो ? या सभी परिस्थितियाँ विपरीत हो ? . बहुत आसान है यदि आप को यह विश्वास है की कण कण में केवल परमात्मा का अस्तित्व है . अर्थात दर्द के रूप में भी परमात्मा ही प्रकट हो रहे है और परमात्मा का स्वरूप आनंद है , सुख है , शांति है . फिर हमे दर्द क्यों महसूस होता है ?. क्यों की हम सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्र नहीं रहते है . हमारे शरीर में छोटे छोटे असहनीय परिवर्तन होते है उनको हम सुख दुःख कहते है . इसलिए लगातार इनको सुख दुःख कहने से ये परिवर्तन अपनी तीव्रता को बढ़ाते है . कैसे ? . जैसे पत्थर पर दिनभर और कई दिनों तक चलने से पत्थर भी घिसने लग जाता है ठीक उसी प्रकार मै दुखी हु , मै दुखी हु , मै दुखी हु ऐसा हर समय कहने और महसूस करने और ऐसे ही वातावरण मे रहने और ऐसा ही लगातार सोचने से मन के गहरे तलो में इस भाव के खांचे बन जाते है और धीरे धीरे शरीर के रूप में प्रकट होने लगते है . फिर हमारा मन इन खाँचो के अनुसार ही जीवन में क्या करना चाहिए उसका दिशा निर्देश देता है . और ऐसे करते करते यह गहरे संस्कार मे बदल जाते है जो जन्म दर जन्म हमारे(आत्मा) साथ चलते है . अर्थात जब हमारी आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है तो मृत्यु के समय अपने साथ मन , बुध्दि , और संस्कार साथ लेकर जाती है . पर यदि शरीर में हमारे पुराने संचित कर्मो के कारण उठने वाली इन संवेदनाओं के प्रति हम जाग्रत है , इन पर एकाग्र है और फिर इन पर ध्यान लगाते है अर्थात प्रभु की शक्ति लगाते है या यु कहे हमारी चेतना शक्ति का प्रयोग करते है तो ध्यान की इस अग्नि में इन संस्कारो के जो बीज है वे जलकर पवित्र ऊर्जा के रूप में परिवर्तित हो जाते है या हम इन संवेदनाओं को जिस रूप में महसूस करते है उनमे बदल जाते है(अर्थात ध्यान में बीमारी को बढ़ा भी सकते है और घटा भी सकते है, यह ध्यान के पीछे लगी हुयी भावना पर निर्भर करता है(यदि भावना में केवल परमात्मा है और जिस रूप में आप उनको अपने मन में कल्पना के माध्यम से देखते है तो वह बीमारी उसी रूप में बदल जाती है ) )
. आगे का भाग
कल शाम 5 से पढ़े……..
खुद को बदलने की इच्छा ऐसे पैदा करे
मेरे प्रिये साधको आज मै आप को वो ज्ञान बताने जा रहा हु जिसे यदि आप ने अनुभव कर लिया तो फिर आप को बदलने से कोई नहीं रोक सकता है . हां यही सत्य है . जब आप आज तक के खुद के जीवन का पूरी गहराई से आकलन करेंगे तो आप को पता चलेगा की जिस किसी ने भी आप की मदद की है उसने बदले मे आप से उसकी कीमत किसी भी रूप में वसूल की है . जैसे आप कभी बहुत बीमार हुए हो और आप के प्रियजन ने आप की मदद की है तो वह हर जगह उसकी चर्चा करके वाहिवाही लूटता है . और आप को जब इस बात का पता चलता है तो धक्का लगता है . क्यों की उन्होंने निश्वार्थ भावना से आप की मदद नहीं करी थी . निश्वार्थ भावना से मदद केवल भगवान का भक्त ही कर पाता है. इसलिए अपने आप को हर किसी के सामने ऐसे ही नहीं परोश दे और वो आप की कमजोरी का फायदा उठाये . आप ईश्वर की संतान है आप कोई साधारण जीव नहीं है . उम्र चाहे आप की कुछ भी हो , और स्वास्थ्य आप का कैसा भी हो सबसे पहले खुद पर विश्वास रखे और समझे की खुद ईश्वर आप के भीतर मौजूद है . पर यह सोच आप के भीतर तभी आएगी जब आप केवल सत्य के मार्ग पर होंगे . इसलिए अपने आप को पूर्ण रूप से ईश्वर के समक्ष समर्पण करके ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी कर्म करने की शक्ति का इस्तेमाल करके विचार करे की मै जो चाहु वो प्राप्त कर सकता हु पर प्राप्त आप को वो ही होगा जो इश्वरिये नियम के अंतर्गत आता हो . जब आप के भीतर यह भाव आ जायेगा तब यदि आप बहुत ही खराब हालत मे होंगे तो खुद परम पिता परमेश्वर किसी भी रूप में आकर आप की मदद करेंगे और बदले में कुछ नहीं चाहेंगे . जब संसार की सारी दवाये असफल हो जाती है तब केवल परमात्मा की अमृत बूटी काम आती है . इसलिए अपने आप को ईश्वर के हवाले करके जीवन के सारे कार्य करे . सेवा करे और बदले में कुछ ना चाहे . फिर देखो क्या चमत्कार होता है . कोई काम छोटा नहीं होता है यदि आप उसे पूरी ईमानदारी से करते है तो . इसलिए हमेशा मेहनत की कमाई ही खानी चाहिए .
Friday, May 24, 2024
परमात्मा के इस नियम को समझे
मेरे प्रिये साधको आज मै आप को परमात्मा के इस नियम को बहुत ही सरल भाषा में समझाने जा रहा हु और आप जब इस नियम को ठीक से समझ जायेंगे तो फिर आप को चिंता मुक्त होने से कोई भी नहीं रोक सकता चाहे अभी आप की कैसी भी स्थिति हो . जब एक व्यक्ति के कैंसर होता है तब उसे उसके जीवन की कीमत का पता चलता है . और जब वह उस कैंसर से जंग जीत जाता है तो सम्मान उन चिकित्सको और व्यज्ञानिको और इस व्यक्ति की कठीन समय में सेवा करने वाले उन तमाम परिवार जनो और रिश्तेदारों इत्यादि को ही मिलता है और यह व्यक्ति आगे चलकर अपने जीवन में वे महान कार्य कर जाता है जिन्हे करने की एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति सोच भी नहीं सकता है . पर हम सब यह भूल जाते है की कैंसर पैदा करने वाले वे जीवाणु अपनी इतनी ताकत नहीं लगाते और इलाज के दौरान आसानी से अपनी हार मान लेते और कैंसर को यह व्यक्ति आसानी से हरा देता तो इस व्यक्ति को कैंसर से कभी डर नहीं लगता और यह व्यक्ति फिर से अपने जीवन में वे सभी अप्राकृतिक कार्य करना शुरू कर देता जिनसे इसको कैंसर हुआ था . और जिंदगी इस व्यक्ति के लिए एक मजाक बनकर रह जाती . ये कभी महान व्यक्ति नहीं बन पाता. इसलिए हमे सम्मान उन कैंसर जीवाणुओं का भी करना है जिन्होंने इस व्यक्ति को खुद के भीतर से जगा दिया और एक महान व्यक्ति बना दिया . जब आप भयंकर चिंता में हो तो इस लेख को पढ़कर थोड़ा एकांत में आ जाए और विचार करे की आप देख सकते है और संसार में ऐसे भी व्यक्ति है जो अभी देख नहीं सकते और अपनी आँखों की रौशनी को पाने की लिए दिन रात परमात्मा से प्रार्थना करते है और इलाज के लिए पूरी दुनिया का चक्कर लगाते है और करोड़ों रूपए खर्च करते है और फिर भी यह विश्वास नहीं है की उनकी आँखों की रौशनी लौट आएगी . अर्थात मै यह कहना चाहता हु की अभी वर्तमान में आप के पास जो कुछ भी है वह अनमोल है उसकी कीमत संसार में कोई भी नहीं चूका सकता . इसलिए एकांत में चिंतन करे की क्या आप उन सब चीजों का आनंद ले पा रहे है जो अभी इसी पल आप के पास मौजूद है . जैसे आप सुन सकते है , आप समझ सकते है , आप देख सकते है , आप चल सकते है , आप के संतान है , आप के पास आज का खाना है , अभी आप जिन्दा है . और संसार में ऐसे कई व्यक्ति है जिनके पास यह सब नहीं है . फिर आप अपने जीवन में परमात्मा की महिमा का अभ्यास अर्थात सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्र होकर अपने महान लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ने से क्यों डर रहे है . आप को किस बात का डर है . यह डर आप के अहंकार के कारण है . इसलिए जब तक आप का अहंकार पिघलेगा नहीं तब तक लक्ष्य की तरफ बढ़ने के लिए रौशनी दिखेगी नहीं . यहां परमात्मा हमारे साथ यह सब इसलिए करते है ताकि हम कोई महान कार्य करके अपने परम पिता को खुश कर सके . इसलिए वे हमे जीवन में इस प्रकार की कठीन परिक्षाओं से गुजारते है ताकि हम तपकर सोना बन जाए . और दूसरे शब्दों में कहे तो हमारे जीवन में परेशानियॉ हम खुद ही पैदा करते है परमात्मा नहीं कैसे ? . परमात्मा से जो हमे कर्म करके अपना भाग्य बदलने की स्वतंत्र शक्ति मिली है उसकी तीव्रता इतनी ज्यादा होती है की हम इस शक्ति को संभाल नहीं पाते है . जैसे हमारे एक शुक्राणु और एक अंडाणु से एक महान मनुष्य का जन्म होता है और हमारे शरीर में इनकी सख्या खरबों में है . इसलिए हम संस्कार वान संतान को जन्म देने के बजाय इस शक्ति का प्रयोग अपनी कामेच्छा (वासनाओं) की पूर्ति के लिए करते है जो कभी भी पूरी नहीं हो सकती है . और ऐसा बार बार करके हम निम्न योनियों में भटकते रहते है और हम संसार में जीने से डरने लगते है . लोगों की नज़रो से गिरने लगते है . क्यों की परमात्मा ने जो हमे अनमोल धन दिया है उसको हम संभाल नहीं पाए और चिंताग्रस्त रहने लगते है . आप जब यह एकाग्रता और ध्यान का अभ्यास करोगे तो आप को पता चलेगा की सब कुछ अपने आप बह रहा है. हमारा अहंकार रुकावट पैदा करता है . कैसे ? . आप प्रयोग करके देखे अपने घर में . आप घर में किसी से शिकायत ना करे और ना ही किसी से अपेक्षा रखे और जितना आप खुश होकर अपने घर वालो की सेवा कर सके वह करे . तो आप को पता चलेगा की धीरे धीरे आप के घर वाले आप को इतना प्रेम करने लगेंगे जिसकी आप अभी कल्पना नहीं कर सकते . फिर प्रश्न आएगा की जैसे मेरा बच्चा रास्ते में चल रहा है और आगे गहरा खड्डा है तो क्या मै उसको रोकू नहीं . इसका जवाब आप के खुद के पास है . जब आप सही बात के लिए घर में किसी को समझाते है तो वे कभी भी आप की बात का बुरा नहीं मानते है क्यों की सबको अपना जीव प्यारा होता है मरना कोई नहीं चाहता है . पर सही क्या है और गलत क्या है पहले हम यह तो समझे . इसे समझने के लिए परमात्मा की महिमा का अभ्यास अनिवार्य है . अर्थात सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्र होकर जीवन की सभी क्रियाये करे .
Thursday, May 23, 2024
बालों के रोग अब अलविदा
Wednesday, May 22, 2024
घर के अशांत माहौल में खुद को कैसे शांत रखे ?
जब आप परमात्मा की महिमा का अभ्यास निरन्तर करते है तो आप को धीरे धीरे यह अहसास होता है की मेरे लिए यही बहुत बड़ी बात है की यह लोग मेरे साथ रह रहे है . क्यों की जब आप बीमार पड़ते है तो यही घर वाले आप को चिकित्सा के लिए अस्पताल ले जाते है , आप की देखभाल करते है . मेरी यह बात आप को अजीब जरूर लगेगी पर जब आप भयंकर पीड़ा में होते है तब आप को किसी के होने का अहसास होता है . आप घर वालों से परेशान तभी होंगे जब आप उनको सुधारने की कोशिस करते हो और वे अपनी मर्जी से जीना चाहते हो . आप खुद के ऊपर लेकर देखना जब आप को कोई काम पसंद नहीं होता है और घर का कोई सदस्य आप को वही काम करने के लिए कहता है तो आप को क्रोध आता है . तो ठीक यही बात आप उन सदस्यों के लिए भी समझने का प्रयास करे . इसका आंतरिक सत्य यह है की कभी ना कभी आप ने इन परिवार वालों से ऐसे कर्म बंधन बांधे है जो अब फलित हो रहे है . इसीलिए तो जब हम बिना समझ के संतान को जन्म देते है तो वह संतान भी हमें नहीं समझ पाती है और हम जीवनभर उससे परेशान रहते है . इसलिए जब हम सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्रता का अभ्यास करते है तो हम कर्मो की इस गुत्थी को सुलझाने में सफल हो जाते है और यही घर वाले हमे अच्छे लगने लगते है . आप देखा करो जब कोई हमारे घर का सदस्य बहुत बीमार हो जाता है और उसने हमे जीवनभर परेशान किया है तो उसके अब जाने के समय पर हम उन सभी अत्याचारों को भूल जाते है और हमे उनके स्वास्थ्य के लिए चिंता होने लगती है . ऐसा क्यों होता है ?. ऐसा इसलिए होता है की जब किसी की मोत सामने दिखने लगती है तो हमे हमारी मोत के बारे चिंता होने लगती है और लगने लगता है की हमारा जीवन तो एक खालीपन से भरा था . हमने हमारा जीवन इन सदस्यों से दूरी मानकर खराब कर दिया है . इसलिए कभी भी मन में ऐसे भावों को जगह ना दे जो दूरी बढ़ाते हो . यदि आप से घर का माहौल देखा नहीं जा रहा है तो कुछ समय के लिए घर से बाहर चले जाये और फिर वापस आ जाये . तब तक माहौल शांत हो चूका होता है . कुछ समय के लिए एकांत में रहे और चिंतन करे खुद के बारे में . अपने पुराने अच्छे दिनों को याद करके खुश हो जाए . क्यों की यह सब हमारे मन के कारण होता है . आप एकाग्र नहीं होंगे तो आप के भीतर जो ईर्ष्या , घृणा , निंदा , बुराई के बीज छिपे हुए है वे पता नहीं कब अंकुरित हो जाये और आप के बुद्धि और विवेक को नष्ट कर दे . फिर आप क्या करेंगे . क्यों की मनुष्य का विवेक खोने पर उसका जीवन नदी में डूबने के समान है . इसलिए बुरे समय का इन्तजार ना करे , बल्कि अच्छे समय में बुरे से बुरे समय की कल्पना करके अपने आप को उस बुरे समय के लिए तैयार करे . तो आप देखंगे आप का बुरा समय कभी नहीं आएगा . क्यों की वास्तविक ध्यान करने वाली की कभी मोत नहीं होती है . वह जीवन और मोत को मात दे देता है . इसलिए मेरे प्यारे साधको प्रभु से एकता का अभ्यास करे . धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
Tuesday, May 21, 2024
खुद से प्रेम ऐसे करो
विचारों का विज्ञानं समझे
परमात्मा की महिमा के अभ्यास में हमे विचारों का विज्ञानं समझना बहुत जरुरी है . क्यों की एक विचार से ही इस सृष्टि की उत्पत्ति हुयी है . विचार एक मायावी शक्ति है जो ईश्वर से प्रकट होती है . अर्थात परमात्मा के अनंत गुणों में से एक गुण विचार प्रकट करना भी है . प्रभु अपनी लीला रचने के लिए विचारों का बहुत ही विधि विधान से प्रयोग करते है . जब एक ही विचार प्रभु से बार बार स्पंदित होता है तो यह विचार सघन रूप लेने लगता है . फिर यही सघन रूप ईश्वर से लगातार संपर्क में रहने के कारण एक शक्ति के संपर्क में रहता है जिसे साधारण भाषा में विश्व शक्ति भी कहते है . अर्थात इस सघन रूप को ईश्वर से यह ज्ञान रुपी शक्ति मिलने के कारण यह अपना एक अलग अस्तित्व मानने लगता है जिसे जीव भाव या अहंकार भाव कहते है . जीव की यह ज्ञान रुपी शक्ति अनेक गुणों में बदल सकती है . जैसे जीव एक ही विचार पर इस शक्ति का लगातार प्रयोग करके उस विचार के अनुरूप इच्छा शक्ति को पैदा कर सकता है . अर्थात जैसे हम अभ्यास के दौरान यह बताते है की यदि आप अच्छा महसूस करते है तो आप अच्छा ही आकर्षित कर रहे होते है . और यदि आप बुरा महसूस करते है तो आप बुरा ही आकर्षित कर रहे होते है . तो फिर बुरे महसूस को अच्छे महसूस में कैसे बदले . यह काम हम विचार शक्ति का प्रयोग करके आसानी से कर सकते है यदि हम इस ऊपर बताये गए ईश्वर के सिद्दांत पर विश्वास करते है तो . बिना खुद की आत्मा पर विश्वास के विचार शक्ति का प्रयोग सफल नहीं होता है . क्यों की विचार ईश्वर से प्रकट होते है तो इनको समझने के लिए ईश्वर पर विश्वास होना अनिवार्य शर्त है . क्यों की ईश्वर ही हमे वह ज्ञान देते है जिससे हम एक विचार को समझकर उसके प्रयोगों को समझने में सफल होते है . ईश्वर मन प्रकट करके जीव को दे देते है . जीव इस मन रुपी सॉफ्टवेयर से विचारों के प्रयोग को समझकर हार्डवेयर पैदा करता है . जिसे साधारण भाषा में शरीर कहते है . अर्थात हमारा शरीर विचारों का सघन रूप है जो सूक्ष्म रूप में एक जन्म से दूसरे जन्म में सूक्ष्म शरीर के रूप में यात्रा करते है . और इनकी यात्रा की सम्पूर्ण जिम्मेदारी कारण शरीर की होती है . अर्थात जीव को अस्तित्व में लाने के लिए ईश्वर एक कारण को पैदा करते है . और उस कारण के समाधान के लिए जीव को ज्ञान रुपी शक्ति प्रदान करते है जिसे हम साधारण भाषा में कर्म करने की स्वतंत्रता कहते है . पर यहां बहुत ही रोचक बात यह है की इस स्वतंत्र शक्ति की तीव्रता इतनी ज्यादा होती है की जीव इसे आसानी से संभाल नहीं सकता है . क्यों की माया के इस खेल के मैदान में जीव सभी जीवों को एक जैसा देखने लगता है . अर्थात जैसे एक व्यक्ति को सभी व्यक्ति एक जैसे लगते है यानी हाथ पैर वाला प्राणी लगता है . पर हकीकत यह नहीं है . इस मनुष्य रुपी शरीर में शैतान का वास भी हो सकता है , कोई बदमाशी प्रकृति वाला व्यक्ति भी हो सकता है या कोई बहुत ही दयालु व्यक्ति भी हो सकता है . इसलिए माया के इस खेल में जीव जिस कारण से इस दुनिया में आया है उसके समाधान के लिए बहुत संघर्ष करता है और जन्म दर जन्म बीतते जाते है और जीव इस जन्म मृत्यु के चक्र में फस जाता है . इसका एक ही उपाय है परमात्मा की महिमा का निरंतर अभ्यास .
साइकोलॉजी क्या होती है ?
Sunday, May 19, 2024
हीन भावना से बाहर आने का विज्ञानं
परमात्मा की महिमा का अभ्यास आप को हीन भावना से हमेशा हमेशा के लिए बाहर निकाल देता है . कैसे ? . जब आप सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्र होकर जीवन की सभी क्रियाये करने लगते है तो आप को हीन भावना क्या होती है और इसका जन्म कैसे होता है और यह कैसे विकसित होती है और इसे कैसे रूपांतरित किया जाता है इन सभी का वास्तविक ज्ञान आप को अनुभव में आने लगता है . जैसे जैसे हमारे मन और शरीर के बीच दूरी बढ़ती है हीन भावना बढ़ने लगती है . क्यों की दूरी बढ़ने के कारण हमारे शरीर में जड़ता बढ़ने लगती है और हम अपने आप को शरीर मानने लगते है और लोगो को भी हम शारीरिक दृष्टि से देखने लगते है . अब क्यों की वास्तविक सत्य यह है की हम शरीर नहीं है परन्तु अपनी जड़ता के कारण हम लोगों के माध्यम से किये जाने वाले व्यवहार को ही सच मान बैठते है और जो हमारे पुराने संचित कर्म है उन्ही के अनुरूप हम इस निर्णय पर खुद ही पहुंच जाते है की इतने लोग यदि हमारे में कमी बता रहे है या हमारी निंदा कर रहे है तो सच में कही ना कही मेरे में कमी जरूर है . और ऐसा लगातार करने के कारण हमारे मन की साइकोलॉजी वैसी ही बन जाती है . जिससे धीरे धीरे हमारी आँखे , कान , त्वचा अर्थात पूरी इन्द्रियाँ इसी साइकोलॉजी से विकसित हो जाती है और मन के गहरे तलो पर अपना प्रेक्षपण छोड़ती है . जो आगे चलकर सघन रूप लेकर शरीर के रूप में प्रकट होने लगती है . अब हम खुद ही अपनी चेतना शक्ति के माध्यम से यह अर्थ लगाए की जो आँख मैं शरीर के साथ लेकर चल रहा हु वह तो अंधी है , सच देख ही नहीं पा रही है और कोई आकर मुझे यह कह दे की चलो मै आप को देखने वाली हीन भावना से अभी मुक्त कर देता हु यदि आप मुझे इजाजत दे की मैं आप की यह आँख ऑपरेशन करके बाहर निकाल दू और फिर आप को एक ऐसा अभ्यास सीखा दू जिससे आप के शरीर मै दूसरी नयी आँख उगने लग जाए जो सच को देखती है . अर्थात यह नयी आँख हीन भावना को नहीं देखती है . तो क्या आप मुझे यह करने की इजाजत देंगे ? . कभी भी नहीं . क्यों की आप को परमात्मा पर विश्वास ही नहीं है . आप अपने आप को शरीर मानकर चल रहे है . और आप ऐसा अनंत जन्मो से कर रहे है . इसलिए यदि आप हीन भावना से मुक्त होना चाहते है तो परमात्मा की महिमा का अभ्यास करे ताकि धीरे धीरे आप के मन , बुद्धि जगने लगे और प्रभु से एकता का अनुभव होने लगे . जैसे जैसे आप के और प्रभु के बीच दूरी घटने लगेगी हीन भावना के ये काले बादल छटने लगते है और एक दिन ऐसा आएगा जब आप 100 % हीन भावना से मुक्त हो जाओगे . यह परमात्मा की गारंटी है . धन्यवाद जी. मंगल हो जी .
शरीर मन आत्मा और परमात्मा कैसे काम करते है - भाग 1
Saturday, May 18, 2024
बिना शर्त प्रेम क्यों जरुरी है ?
जब हम परमात्मा की महिमा का अभ्यास करते है अर्थात सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्रता बढ़ाते हुए जीवन की सभी क्रियाये करते है तो हमे हमारे शरीर की भीतरी गंध , सुगंध का अनुभव होने लगता है . साथ ही सर्वव्यापकता का भी अनुभव होने लगता है . हमारा पेट ख़राब है तो हमे पेट की भीतर की सड़न की गंध आने लगती है , या यदि शरीर में कही भी कोई गाँठ है तो उसके भीतर जो पस पड़ गया उसकी भी गंध आने लगती है , हमारे खून , चमड़ा , श्वासो , मांस , हड्डियों इत्यादि की गंध का हमे अनुभव होने लगता है . जब हम इस गंध से घृणा करते है तो इसके स्त्रोत में विकृति आने लगती है क्यों की हमने माया का अपमान किया है . वह प्रभु की ही गंध है और हमने इसे दुर्गन्ध मान लिया है. अर्थात जो है नहीं वह मान लिया इसलिए इस शरीर रचना के अस्तित्व को खतरा होने लगता है . इसीलिए तो परमात्मा कहते है की आप जैसे भी हो उसे ही पहले स्वीकार करो और बिना शर्त प्रेम करो . तभी भीतर से रूपांतरण शुरू होगा . इसीलिए तो शरीर में जो हमे कड़ापन , ढीलापन , थकान , आलस , या कुछ भी परिवर्तन होता है उसे बहुत ही प्रेम से परमात्मिक अनुभूति के रूप में स्वीकार करना बहुत जरुरी है यदि हमे शारीरिक बीमारियों से हमेशा के लिए मुक्ति चाहिए तो . ठीक इसी प्रकार हमे बाहरी लोगों से , और अन्य सभी जीवों से बिना शर्त प्रेम करना बहुत जरुरी है चाहे उन्होंने हमे किसी भी तरीके से परेशान किया हो या कितना भी नुक्सान हमे पहुंचाया हो . क्यों की उन सभी के रूप में परमात्मा स्वयं प्रकट हो रहे है . पर माया की शक्ति के कारण हमे वे सब अलग दिखाए पड़ते है और हम उनको अलग मानकर सत्य से विमुख हो जाते है और प्रेम करने की शक्ति खो देते है . क्यों की हम माया को सच मानकर प्रभु से विमुख हो गए और यही सबसे बड़ा कारण है की हमे इन कष्टों का सामना करना पड़ता है . आत्म ज्ञान का सही अर्थ यह होता है की हमने माया का भी सम्मान करना सीखा और ब्रह्मा के साथ भी रहे . बिना इस अभ्यास के हम बिना शर्त प्रेम करने में आंशिक रूप से तो सफल हो सकते है पर पूर्ण सफलता नहीं मिलती है . और शरीर को हम कष्टों में डालकर कहने लगते है की संसार में कोई किसी का नहीं है , शरीर नश्वर है , संसार नश्वर है , यहां दुःख ही दुःख है . यह सब बाते हम बार बार बोलकर हमारे मन में गहरे तलो पर जमा कर लेते है जिसे अवचेतन मन कहते है . फिर यही बाते धीरे धीरे पोषित होते हुए संस्कारो में बदल जाती है और सघन रूप लेने लगती है जिसे आम भाषा में शरीर कहते है . इस प्रकार शरीर रुपी इन संस्कारो को अभ्यास के माध्यम से दिव्य शरीर में बदला जाता है जो बहुत ही मजबूत होता है और प्रकृति से अप्रभावित रहता है . पर फिर भी यदि हमारी इच्छा वर्तमान शरीर को दिव्य शरीर में बदलने की नहीं होकर केवल बीमारियों से मुक्ति प्राप्त करने की है और बिना रोगों के हम सामान्य जीवन जीना चाहते है तब भी यह अभ्यास करना बहुत जरुरी है . बिना शर्त प्रेम करना कोई एक दिन मे नहीं आता है पर यदि हम ठान ले तो फिर यह असंभव नहीं है . वैसे तो मनुष्य के लिए कुछ भी असंभव नहीं है यदि उसे परमात्मा अर्थात खुद पर 100 % विश्वास है तो . क्यों की मनुष्य जीवित ही विश्वास के कारण है . अर्थात मनुष्य को यह विश्वास है की वह जिन्दा है , उसकी श्वास चल रही है , उसे उसका शरीर अनुभव में आ रहा है , उसे प्रकृति का अहसास हो रहा है , उसको माया के ऊपर विश्वास है . यहां बहुत ही ध्यान देने योग्य बात यह है की हमने कहा है की मनुष्य को माया पर विश्वास है इसलिए वह जिन्दा है . इसका अर्थ यह है की माया के पीछे जो सत्य छिपा है उस पर विश्वास है . जैसे हम घर परिवार में कहते है की हम तो ईश्वर की कठपुतली है अर्थात हमारा अलग से कोई अस्तित्व नहीं है . इसलिए सच में ना तो हमारा यहां कोई दुश्मन है और ना ही मित्र है बल्कि हम सब एक ही ईश्वर की संतान है और हमारे बीच केवल प्रेम का रिश्ता है . धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
क्या आप को पता है इस बात का ? पूरा देखे | परमात्मा की महिमा
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