Swaroop Darshan

आखिर क्या है पाप और पुण्य का गहरा राज ?

 

आखिर क्या है पाप
और पुण्य का गहरा राज
?

इस राज का पता
तभी चलता है जब हम परमात्मा की महिमा का निरन्तर अभ्यास यहां समझाई जा रही विध्या के
साथ करते है . क्यों की इस राज को समझ के साथ पड़ने से या इसके वीडियो देखने से
अभ्यास की गति तेज होने लगती है और अभ्यास के दौरान आने वाली शंकाओं का समाधान
अपने आप होने लगता है . इसलिए हम बार बार कहते है की परमात्मा की महिमा चैनल और
ब्लोग्स को देखना
,पड़ना और सुनना
बहुत जरुरी है
यदि हम साधना में सच में सफलता चाहते है तो .

यहां हम पाप और
पुण्य की बात सभी जीवों के विषय में कहेंगे . पाप और पुण्य केवल परमात्मा की माया
मात्र है परन्तु यह माया परमात्मा के सत्य नियम के साथ चलती है . यदि कोई भी जीव
इस संसार को बहुत अच्छे से जीना चाहता है
, भोगना चाहता है , इसमें रहना चाहता है , इसके साथ चलना
चाहता है
, उसे भीतर से पता है की वह
क्या कर रहा है
, या किसी भी घटना
के बाद में पता चलता है
, या उसमे थोड़ी
बहुत भी परमात्मा के प्रति सजगता है
, या वह अपने शरीर के अस्तित्व की रक्षा चाहता है और उसके लिए उसमे थोड़ा बहुत भी
विवेक है तो ऐसा जीव जब प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करता है तो उसको पाप
100
%
लगता ही लगता है . और प्रकृति की रक्षा में
अपना योगदान देता है तो उसे पुण्य लगता ही लगता है . अब चाहे वह स्वीकार करे या
नहीं प्रकृति यह उपहार उसको किसी भी रूप में दे देती है .

अब प्रश्न यह
उठता है की पाप पुण्य केवल मनुष्य को ही लगता है पशु पक्षियों को नहीं क्यों की वे
भोग योनि में होते है . यह आंशिक सत्य है . पूर्ण सत्य यह है की जीव की शारीरिक
सरंचना एक सीमा तक ही भेद कर पाती है इसके बाद यह जरुरी नहीं है की कोई जीव मनुष्य
की तरह दीखता हो और पशुओं की तरह व्यवहार नहीं करता हो और कोई जीव पशु पक्षी की
तरह दीखता हो और समझ मनुष्य की तरह नहीं रखता हो
. अर्थात इन्द्रियों के माध्यम से
किया गया अनुभव पूर्ण सत्य नहीं है . इसको हम निम्न उदाहरण से आसानी से समझ सकते
है :

एक व्यक्ति है जो
रास्ते में चल रहा है और अचानक उसके पैर के निचे एक कीड़ा दबकर मर जाता है तो क्या
इस व्यक्ति को पाप लगेगा
?

इसका उत्तर कई
बातो पर निर्भर करता है . जैसे:

यदि यह व्यक्ति
शरीर भाव से पूर्ण रूप से मुक्त हो चूका है और अपने आप को परमात्मा को पूर्ण रूप
से समर्पित कर चूका है अर्थात प्रकृति से ऊपर उठ चूका है तब इसको ना पाप लगेगा और
ना ही पुण्य लगेगा .

यदि यह व्यक्ति
शरीर भाव में जितना प्रतिशत जी रहा है तो उसी अनुपात में इसको पाप लगेगा .

यदि यह व्यक्ति
जानबूझकर कीड़ा मारता है और कीड़ा अभी जीना चाहता है अर्थात अभी परमात्मा की इच्छा
नहीं है या यु कहे की  कीड़े का जीवन चक्र(
life
cycle) पूरा नहीं हुआ है  तो 100 %
पाप लगेगा .

यदि यह व्यक्ति
अनजाने में कीड़ा मारता है और कीड़ा अभी जीना चाहता है तो कीड़े से निकली प्रतिक्रिया
इसको प्रभावित अवश्य करती है और वह किसी भी रूप में और कभी भी प्रभावित कर सकती है
.

पर यदि कीड़े की
मोत के लिए यह व्यक्ति निम्मित बनता है अर्थात परमात्मा स्वयं यह चाहते है तो इसको
पाप बिल्कुल नहीं लगेगा . अर्थात पाप और पुण्य उन सभी जीवो को लगते है जो इस माया
को सच मानकर जीते है . पर फिर भी यदि हम मोटे तोर पर बात करे तो पशु पक्षी भोग
योनि में होते है उनको पाप पुण्य नहीं लगते है और केवल मनुष्य भोग योनि के साथ साथ
कर्म योनि में भी होते है इसलिए मनुष्य को पाप पुण्य अवश्य लगते है
. मनुष्य अपने
सर्वश्रेष्ठ कर्मो से ईश्वर को प्राप्त कर सकता है और जघन्य पाप कर्मो से अपना
सर्वनाश कर सकता है अर्थात बेहद नीच योनियों में वापस जा सकता है . पर ज्यादातर
मनुष्य एक जन्म से दूसरे जन्म में मनुष्य ही
बनता है पर वह बात अलग है की वह किस कोटि का मनुष्य बनता है यह उसके पुरे जीवन के
कर्मो से निर्धारित होता है . मनुष्य सोचे की पुरे जीवन जघन्य पाप करे और अंतिम
समय में परमात्मा को पूर्ण रूप से भाव में ले आये तो  ऐसी कोई दुर्लभ  घटना ही होती है
. क्यों की यह सारा खेल हमारे
मन से चलता है इसलिए मन को निर्मल करने का काम निरन्तर करना होता है यह तपस्या से
ही संभव होता है . बाकी सब धोखा ही धोखा है . इसलिए निरन्तर हमे परमात्मा की महिमा
का अभ्यास करते रहना चाहिए .
 

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