Swaroop Darshan

क्या भगवान कृष्ण ने माखन खाया था ?

मेरे प्रिये
मित्रों आज परमात्मा की कृपा से आप का यह मित्र आप के भीतर दिन रात चलने वाला यह
प्रश्न की क्या भगवान कृष्ण ने माखन खाया था
?. क्यों की आज पूरी दुनिया में ज्यादातर मेरे मित्रों का
मानना है की गाय का माखन
, घी , दूध , दही , पनीर , गोमूत्र इत्यादि अमृत तुल्य है . और इनके सेवन
से असाध्य रोगों का इलाज होता है . ऐसा मेरे कई मित्र मानते है . दूसरी तरफ हम
प्रभु के इन लेखों में पढ़ रहे है की पशुओं से प्राप्त चीजों के सेवन से हम
पूर्णतया रोग मुक्त नहीं हो सकते है .

सबसे पहले तो
कृष्ण का अर्थ होता है परम चेतना से निर्मित या अवतरित चेतना जो अपने आप में पूर्ण
है
,
ज्ञानी है ,
जिसका ह्रदय विराट हो ,
जो अवतारी पुरुष हो ,
जो सबका कल्याण चाहता हो
. अर्थात यह चेतना प्रेम की वह उच्च अवस्था है जहाँ यदि कोई साधारण व्यक्ति प्रेम
की भाषा सीख जाए तो कृष्ण से मिलने में फिर देर नहीं लगती है . वास्तविक सत्य तो
यह है की आप खुद ही कृष्ण है पर आत्मा पर चढ़े माया के परदे के कारण अभी इसकी
अनुभूति नहीं हो रही है
.

आज आप जो कुछ भी
देखते है
, सुनते है , मह्सूस करते है कल यही इतिहास बन जाता है .
इसलिए इसका मतलब यह नहीं है की जो जो अनुभव आप ने किये है वे सच नहीं है . इस
संसार में सबकुछ सच ही है यदि हम इसे सच की आँखों से देखते है तो . अर्थात पहले यह
विश्वास करना बहुत जरुरी है की कण कण में केवल परमात्मा का अस्तित्व ही है .

हमने शास्त्रों
में जो पढ़ा है की भगवान कृष्ण ने माखन खाया था. फिर आज चिकित्सा विज्ञान यह क्यों
कह रहा है की पशुओं से प्राप्त चीजे हमारे ह्रदय के लिए सही नहीं होती है . घी से
कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है
, पनीर और अन्य
सम्बंधित चीजों का सेवन कई प्रकार के रोगों को जन्म देता है . और अब तो
चिकित्सा  विज्ञान ने यह प्रमाणित भी कर
दिया की मनुष्य के लिए केवल उसकी माँ का दूध ही सर्वोत्तम है . यह सब क्या है
?.

दूसरी तरफ
चिकित्सा विज्ञान में मेरे अनेक मित्र ऐसे भी है जो यह दावा करते है की गाय का दूध
, घी , मख्खन , छाछ , गोमूत्र इत्यादि
हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक है .

अब हम कैसे पता करे
की आखिर इन सभी में सही कौन बोल रहा है
?.

तो आप इसे निम्न
उदाहरण से आसानी से समझ सकते है :

मेरे कई मित्रों
के घरों में कई प्रकार के दुधारू पशु है . और कई बार घर में किसी छोटे बच्चे को
दूध नहीं मिलता है तो वह पहले तो घर वालों से दूध पिने के लिए जिद्द करता है और
फिर यदि उसे घर वाले दूध नहीं देते है तो वह घर में बंधे पशु के बछड़े को खुला छोड़
देता है जो अपनी माँ का पेट भर के दूध पी जाता है . और इससे इस छोटे बच्चे को बहुत
ख़ुशी मिलती है . और जब घर वाले दूध निकालने के समय पर पशु के पास जाते है तो वह
पशु अब दूध नहीं देता है . और घर वाले पता करके यह समझ भी जाते है की इसके बछड़े ने
सारा दूध पी लिया है इसलिए यह पशु अब दूध नहीं दे रहा है .

तो फिर वे आगे से
क्या करते है की बछड़े को पशु से दूर खूँटे से बाँध देते है और दूध निकालने के समय
पहले थोड़ी देर बछड़े को खुला छोड़ देते है . अब जो बछड़ा दिन भर से भूखा था वह टूटकर
इसकी माँ के पास जाकर दूध पीने लगता है . अब बछड़े का पेट भरा या नहीं हमारे को यह
चिंता रहती है की यदि यह बछड़ा ही सारा दूध पी जाएगा तो हम क्या पियेंगे. और ऐसा
सोचकर बड़ी जबरदस्ती से दूध पीते हुये बछड़े को उसकी माँ से अलग कर देते है और फिर
हम उस पशु का दूध निकालना शुरू कर देते है .

अब कोई भी
व्यक्ति किसी बच्चे को उसकी माँ से अलग करेगा तो वह माँ और बच्चा कैसे उस व्यक्ति
से प्रेम कर सकते है
?.

बल्कि उन दोनों
की आत्मा से ऐसी नकारात्मक तरंगे निकलती है जो अब जो दूध दुहा जा रहा है वह
पौष्टिक दूध नहीं बल्कि हमारे स्वास्थ्य को नुक्सान पहुंचाने वाला पदार्थ बन गया
है .

इसलिए जब भगवान
कृष्ण बाल्यावस्था में थे तो उनके गाँव में सभी लोग पशुओं से सारा दूध निकाल लेते
थे और उनके बछड़ों को दूध बहुत ही कम मात्रा में पीने देते थे . इसलिए कृष्ण ने एक
तरकीब सोची की क्यों ना इन्होंने जो दूध गायों से निकाला है और उससे मख्खन बनाया
है उसको ही चुरा लिया जाए . और ऐसे अनेक तरीके
भगवान कृष्ण ने उन पशुओं को न्याय दिलाने के लिए अपनाये थे जिसका वास्तविक परिणाम यह हुआ था की नंदगांव
में सभी लोग पशुओं की सेवा पुरे दिल से करने लग गए थे
. पर प्रकृति समय की करवट अवश्य लेती है . फिर
धीरे धीरे लोग इस ज्ञान को भूलने लग गए काल के प्रभाव के कारण और फिर से पशुओं पर
अत्याचार करना शुरू कर दिया .

अब समय बदल चुका
है . पूरी दुनिया की चेतना निरंतर परम चेतना की तरफ बढ़ रही है . अर्थात लोग अब
जाग्रत हो रहे है . आज का युवा जाग रहा है . वह अपने खान पान को लेकर बहुत सतर्क
रहने लग गया है . आज के वैज्ञानिकों को यह विश्वास हो गया है की हमारे भोजन पर
हमारे भावों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है . इसलिए हमे क्रियायोग ध्यान का गहरा
अभ्यास करके यह सच पता करना चाहिए की
आखिर क्यों केवल हमारे लिए हमारी माँ के अलावा किसी और का
दूध ठीक नहीं रहता है
?’ .

हां यह बात अलग
है की यदि आप किसी पशु की इस प्रकार से सेवा करते है की वह पशु आपकी इस सेवा से
प्रसन्न होकर आप के लिए उसके बछड़े के पेट भरने के अतिरिक्त ओर दूध दे देता है  तो इस प्रकार से प्रसन्न होकर पशु के द्वारा
दिया गया दूध यदि आप किसी भी सही रूप में प्रयोग करते है तो वह फिर स्वास्थ्य के
लिए हानिकारक नहीं होता है बल्कि लाभदायक होता है . धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

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