Swaroop Darshan

क्रियायोग – नास्तिक और आस्तिक को गहराई से समझे

आज मैं आपको क्रियायोग के माध्यम से नास्तिक
और आस्तिक के वास्तविक स्वरुप को समझा रहा हूँ .

पहले मैं आस्तिक के बारे में बात कर रहा हूँ . आस्तिक का
सही अर्थ होता है की कोई भी व्यक्ति जो किसी भगवान
, मंदिर , पूजा , पाठ,
मस्जिद , गुरुद्वारा , चर्च , मूर्ति ऐसे अनेक
माध्यमों में आस्था रखकर
,
उनमे  विश्वास करके परमात्मा से जुड़ने की क्रिया करता
है . अर्थात ऐसा व्यक्ति परमात्मा को मानता है और कहता है की इस संसार को परमात्मा
किसी ना किसी रूप में आकर चला रहे है .

अब मैं नास्तिक के बारे में समझा रहा हूँ.

नास्तिक व्यक्ति कहता है की ना भगवान होते है , ना देवता होते है
, ना अल्लाह होते
है
, ना परमात्मा होते
है अर्थात कुछ भी नहीं होता है . नास्तिक किसी को भी नहीं मानता है . ना वह दान
पुण्य को मानता है और ना ही पूजा पाठ को . नास्तिक किसी अन्य लोक को भी नहीं मानता
है . वह हमेशा तर्क वितर्क करता है
, वह जैसे किसी कुर्सी का निर्माण करता है तो कहता है की यह
कुर्सी मेने बनाई है
, मैंने मेहनत की
है इसलिए इस पर मेरा ही अधिकार है . मेरे से इस कुर्सी को कोई छीन नहीं सकता
(जब तक मै नहीं चाहु या पैसे में नहीं बेच दू ) है . अर्थात
नास्तिक व्यक्ति भौतिक वस्तुओं को ही सच मानता है
, वह एक व्येज्ञानिक की तरह सोच
रखता है
, वह
इस संसार को तार्किक रूप से देखता है . विज्ञानं परमाणु की बात करता है जबकि सच यह
है की परमाणु का अस्तित्व है ही नहीं (यह आप क्रियायोग के अभ्यास से ही अनुभव कर
सकते हो )
. पर यही कुर्सी जब एक आस्तिक व्यक्ति बनाता है तो वह कहता है
की मैंने मेरा कर्म किया है अब फल देना परमात्मा के हाथ में है . अब यह कुर्सी वही
जाएगी जहा इसका जाने का योग है.

पर
जब आप क्रियायोग के अभ्यास से जानेंगे की नास्तिक और आस्तिक में क्या अंतर् है
? तो आप को चमत्कारिक जवाब मिलेगा .

क्रियायोग के अभ्यास से आपको अनुभव होगा की नास्तिक और
आस्तिक दोनों एक ही होते है इनमे कोई अंतर् नहीं होता है .

ऐसा क्यों ?. क्यों की आप गौर करे की नास्तिक व्यक्ति भी उन्ही चीजों को भोगकर जिन्दा है
जिन्हे आस्तिक व्यक्ति भोगकर जिन्दा है . जैसे नास्तिक भी श्वास ले रहा है
, पानी पी रहा है , खाना खा रहा है , काम कर रहा है, नींद ले रहा है , शादी कर रहा है , बच्चे पैदा कर
रहा है . अर्थात जीवन के सभी सुख भोग रहा है . यह जो भोग की वस्तुए है जैसे पानी
नास्तिक ने नहीं बनाया पर पी रहा है
, फल उसने नहीं उगाया पर खा
रहा है . यदि नास्तिक सोचे की मेने तो पैसे से फल
खरीदे है . तो वह क्या करेगा जब फल उसको पचेगा नहीं. वह आगे दिमाग लगाएगा की मुझे
पाचनतंत्र को ठीक करना है . इसके लिए वह किसी चिकित्सक के पास जाता है और कहता है
की साहब मेरा पाचनतंत्र सही से काम नहीं कर रहा है
, मै जो भी खा रहा हूँ वह पच नहीं रहा है . अब यह चिकित्सक
कहता है की आप थोड़ा इन्तजार करे मै अगरबत्ती करलु उसके बाद आपको देखता हूँ. जब यह
आस्तिक चिकित्सक अगरबत्ती करता है तो परमात्मा से यही तो प्रार्थना करता है की हे
परमात्मा मुझे ऐसा ज्ञान दीजिये जिससे मै मेरे मरीजों का सही इलाज कर सकू और मेरे
ये मरीज पूर्ण स्वस्थ हो जाये . अर्थात इस आस्तिक चिकित्सक ने इस नास्तिक मरीज के
लिए भी परमात्मा से ही प्रार्थना करी है . और इस आस्तिक चिकित्सक से इस नास्तिक
मरीज का इलाज हो जाता है . अब यदि यह नास्तिक मरीज भीतर से परमात्मा को नहीं
मानता तो आस्तिक चिकित्सक वाले परमात्मा इस नास्तिक को ठीक क्यों करते
?. और यदि हम यह सवाल इस नास्तिक मरीज से करेंगे तो वह कहेगा
की मै तो चिकित्सक की दवा से ठीक हुआ हूँ . परमात्मा ने थोड़े ही मुझे ठीक किया है
?. और जब आस्तिक चिकित्सक से पूछेंगे तो वह आस्तिक चिकित्सक
जवाब देगा की मेने तो दवा दी है बाकी ठीक करना नहीं करना परमात्मा के हाथ में है .
अर्थात आस्तिक चिकित्सक खुद कह रहा है की मेने इस नास्तिक मरीज को ठीक नहीं किया
है बल्कि परमात्मा ने मेरे माध्यम से इस नास्तिक मरीज को ठीक किया है . अब यह
नास्तिक मरीज अपने अहंकार के कारण यह सच स्वीकार नहीं करे की उसका इलाज परमात्मा
  ने किया है तो इसमें दूसरा कौन क्या कर सकता है . परमात्मा अपना खुद का अहसास कराने के लिए इस नास्तिक मरीज
को दवा से भी ठीक नहीं करते है . जब यह सभी उपाय करने के बाद थक हार के मोत को
स्वीकार कर लेता है तब अंत में इसे अहसास होता है यह सब मै पुरे जीवन बकरी की तरह
मै मै कर रहा था
,
मेरा अलग से कोई अस्तित्व नहीं है . मै तो
परमात्मा की ही संतान हूँ . नास्तिक को अंत में समझ में आ जाता है की परमात्मा के
अलावा कुछ भी नहीं है .

परमात्मा
ऐसा भेद क्यों करते है
?

अपनी लीला
को चलाने के लिए परमात्मा यह माया रचते है . जिसमे एक व्यक्ति से कहलवाते है की वह
आस्तिक है और दूसरे से कहलवाते है की वह नास्तिक है
. इसका अनुभव आपको जब आप पूर्ण श्रद्धा , भक्ति और विश्वास
से क्रियायोग का अभ्यास करते है  तो होने
लगता है . और एक समय आता है जब आप पूर्ण सत्य से जुड़ जाते है और पता चलता है की
परमात्मा के अलावा सब कुछ धोखा है . परमात्मा ही अलग अलग देवी देवताओं
, राक्षसों , मनुष्यो , जीव जंतुओं, कीट पतंगों ,
नदी पहाड़ों, भूत प्रेतों कुल
मिलाकर पूरा संसार परमात्मा का साकार रूप है . परमात्मा ही  दृश्य जगत और अदृश्य जगत दोनों रूपों में अपने
आपको व्यक्त कर रहे है .

आप को यह
नास्तिक और आस्तिक का सच तभी सही सही समझ आएगा जब आप क्रियायोग का नियमित अभ्यास
करेंगे . बिना अभ्यास के आप लाख समझने का प्रयास करना समझ में नहीं आने वाला .

प्रभु का यह लेख यदि आपको फायदा पहुँचाता है तो आप की
यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है की आप इस लेख को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक भेजकर आप
हमारे इस सेवा मिशन में अपना अमूल्य योगदान देकर प्रभु के श्री चरणों में स्थान
पाकर धन्य हो जाए . परमात्मा आपको हमेशा ओजस्वी रखे . धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

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