Swaroop Darshan

मन को सृजन की क्रिया से जोड़ने पर आप हर पल खुश रहने लगते है

आज हम क्रियायोग ध्यान के उन हिस्सों को छूने का प्रयास करेंगे जिनको छूने पर आप को वास्तविक ख़ुशी की अनुभूति होगी .

जैसे एक स्त्री कई वर्षो से एक संतान को जन्म देना चाहती है . उसके मन में यह अभिलाषा है की ओर स्त्रियों की भांति उसके भी घर के आँगन में एक नन्ही परी या बच्चा खेले . और इस स्त्री की यह अभिलाषा एक प्राकृतिक इच्छा है . क्यों की इच्छा रखना ही जीव का धर्म होता है . यदि जीव इच्छा नहीं रखेगा तो फिर यही जीव आत्मा में रूपांतरित हो जाता है और यही आत्मा फिर परमात्मा में विलीन हो जाती है . और इस प्रकार से इस जीवात्मा का जीवन चक्र समाप्त हो जाता है . पर यदि स्त्री यह चाहती है की उसका भी एक सुंदर संसार हो , उसके सभी सपने पुरे हो , वह भी अपने इस संसार में रहकर अपनी हर इच्छा को पूरी होते हुए देखे तो यह भी प्रभु की ही भक्ति होती है . जीवन चक्र समाप्त करना मतलब निराकार की साधना करना होता है और जीवन चक्र को सृजन के लिए जीना मतलब साकार की साधना करना होता है .

आज हम परमात्मा के साकार रूप की बात करेंगे .

जब एक स्त्री माँ बनती है तो इस स्त्री को माँ बनने के दौरान बहुत सी कठीनाइयों का सामना करना पड़ता है और इसको कई प्रकार के दुखों को अपने गर्भ में पल रहे मासूम के लिए हंसकर सहन करना पड़ता है . और एक दिन यही स्त्री जब इस मासूम को जन्म देती है तो इसे उस ख़ुशी की अनुभूति होती है जिसके आगे नो माह की पीड़ा भी ख़ुशी में बदल जाती है . अर्थात इस स्त्री ने धरती पर एक शिशु का सृजन किया है  अर्थात परमात्मा को साकार रूप में पूजा है . अब हमे यह समझना चाहिए की जब एक गेहूँ का बीज बोने से उसको हम हज़ारो टन नये गेहूँ में बदलने की शक्ति रखते है तो फिर क्यों न हम हमारे मन को सृजन के ऐसे कार्यो में लगाए की हमारा मन हरपल ख़ुशी के अहसास में रहे . अर्थात हरपल ख़ुशी का अहसास का अर्थ होता है की अब हम हरपल परमात्मा से ही जुड़े है . यदि हम हमारे मन को सृजन की जगह किसी भी रचना को विकृत करने में लगायेंगे तो फिर हम हर पल खुश नहीं रह सकते है .

क्यों ?

क्यों की यदि हमारे साथ कोई भी गलत हरकत करता है तो वह हमें बर्दास्त नहीं होती है . अर्थात वह हमारे मन का नाश कर रहा होता है . और मन ही शरीर का रूप लेता है . इसलिए यदि कोई हमारे डंडा मारता है या हमारे गाल पर थप्पड़ मारता है तो हमे दर्द होता है , हमे पीड़ा होती है . मतलब वह हमारा नाश कर रहा है . और वह कह यह रहा है की मै आप को सुधारने के लिए पीट रहा हूँ या पीट रही हूँ . पर जब मारपीट करने वाले इस व्यक्ति से कोई सज्जन यह पूछे की यदि आप खुद भी कोई गलती करे और सामने वाला आप को भी डंडा मार के या थप्पड़ मार के ज्ञान देने की कोशिश करे और साथ ही यह कहता जाए की वह तो आप को सुधारने के लिए मारपीट कर रहा है तो क्या आप उसका ऐसा व्यवहार बर्दास्त कर लेंगे .

कभी भी नहीं करेंगे ?

इसीलिए तो क्रिया योग ध्यान सत्य और अहिंसा का मार्ग है . इसलिए जब एक माँ प्रसव पीड़ा सहन करती है तो वह भीतर से खुश होकर इसे सहन करती है ना की घरवालों और बाहर वालों पर खीजकर .

और यही माँ जब प्रसव पीड़ा से परेशान होकर इसका गुस्सा घरवालों या बाहर वालो पर निकालती है तो फिर गर्भ में पल रहा शिशु भी पीड़ित होता है और परमात्मा उसका मन इस विचार के माध्यम से सृजित करते है की आगे चलकर यही शिशु बात बात पर अपनी माँ से झगड़ा करता है .

क्यों की जब परमात्मा इस शिशु रुपी रचना का सृजन इस माँ के गर्भ में कर रहे थे तो यही माँ परमात्मा की इस सृजन क्रिया पर विश्वास नहीं करने के कारण प्रभु के इस सृजन कार्य को बाधित कर रही थी . अर्थात यही माँ सृजन क्रिया का नाश कर रही थी . इसीलिए जब कोई माँ अपने शिशु को जन्म देने के बाद अज्ञान के कारण खुद के स्तनों का दूध नहीं पिलाती है तो वह शिशु भी उस माँ का सगा नहीं होता है . और आज यही कारण है की हमारे बच्चे हमारी नहीं सुन रहे है . क्यों की हमने खुद ने ही उनको प्रकृति से दूर कर रखा है . जब हमारा बच्चा मिट्टी में खेलने के लिए रोता है तो हम उसे यह कहकर मना कर देते है की कपड़े गंदे हो जायेंगे या मिट्टी से संक्रमण फ़ैल जायेगा या और कुछ कहकर रोक देते है . बच्चे के मन में भीतर से उठी इस प्राकृतिक इच्छा को हमारे माध्यम से दबाने के कारण यही इच्छा अन्य विस्फोट के रूप में मन से बाहर निकलती है . तभी तो आज हम हमारे माता पिता को दोष देते है की काश हमारे ही माता पिता हमें अच्छे संस्कार दे देते तो आज हम हमारे इस जीवन में कष्ट नहीं पाते .

अब इस लेख को पड़ने के दौरान कई माता पिता यह सोच रहे होंगे की हम तो हमारे बच्चो को बहुत अच्छे संस्कार देना चाहते है पर हमारे बच्चे हमारी सुनते ही नहीं है . बल्कि उल्टा हमे ही भला बुरा कहने लगते है .

इन सब का कारण हम खुद ही है . हमे केवल क्रियायोग ध्यान का पूर्ण विश्वास के साथ इस सोच को आधार बनाकर अभ्यास करना चाहिए की हमारी हर एक क्रिया से नया सृजन होगा . जब हम हमारे मन को सृजन की क्रिया में लगा देंगे तो हरपल जैसे हमारा नूर बढ़ता है और हम उसे देखकर बहुत खुश होते है ठीक इसी प्रकार हमारे माध्यम से सृजित होते हुए जब हम हर रचना को देखेंगे तो हम हर पल खुश रहने लगेंगे . धन्यवाद जी . मंगल हो जी . 

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