हमारे परमात्मा
आज इसे बहुत ही सरल तरीकों से हमे समझा रहे है की आखिर हमे अपमान महसूस क्यों होता
है . जैसे हम दो मित्र कही रिश्तेदारी या किसी अन्य जगह जाते है या किसी मंच पर
सभी विभागों के मंत्री विराजमान है और प्रधानमन्त्री कुछ विशेष मंत्रियो का ही नाम
अपने भाषण में लेते है और उनके काम की तारीफ करते है तो जाहिर सी बात है की शेष
मंत्रियो को कुछ न कुछ मात्रा में मन में अपमान महसूस अवश्य होगा चाहे बाहर से वे
कितना ही छिपाने का प्रयास करे .
ऐसा
क्यों होता है ?
क्यों की
वास्तविक रूप में हम सभी एक ही परमात्मा की संतान है पर अपनी अपनी योग्यता के कारण
हमारे अलग अलग पदों के तमगे (छाप) लगे हुए है और हमे उस पद की गरिमा को बनाये रखने
के लिए कई प्रकार के ढोंग करने पड़ते है . पर भीतर से हमारी आत्मा सभी जीवों से इस
प्रकार से जुड़ी हुयी है जैसे गुलाब से खुशबु . अर्थात प्रत्येक जीव सर्वव्यापी है
यह परम सत्य है . पर यदि किसी आत्मा के ऊपर अहंकार की परते ज्यादा मोटी है तो उसे ‘जीव अकेला है‘ ऐसा प्रतीत होता है और साथ ही यह भी अनुभव होता है की मेने
जितनी भी योग्यता प्राप्त की है वह ईश्वर की शक्ति से मेने खुद ने ही प्राप्त की
है . पर यह आंशिक सत्य ही है . परम सत्य यह है की आज तक मेने जो कुछ भी योग्यता
प्राप्त की है उसमे आप सभी का भी समान योगदान है . क्यों की मै आप सबमे निवास करता
हूँ और आप सभी भी मेरे में निवास करते है .
इसलिए
अपमान केवल उन्ही व्येक्तियों को महसूस होता है जिन्हे अभी सर्वव्यापकता की
अनुभूति नहीं हुयी है . पर क्यों ?
क्यों की उनकी
आत्मा मन के माध्यम से भीतर से यह कहती है की मै भी तो आप का ही मित्र हूँ फिर
मुझे नज़रअंदाज क्यों किया जा रहा है .
जैसे एक छोटा बच्चा अपनी माँ से खुद को भी घुमाने के लिए साथ चलने की जिद्द करता
है और माँ कहती है की तुम यही रहो मै जरा बाजार जाकर जरुरी सामान लेकर आती हूँ .
पर बच्चा आत्मा की भाषा समझता है ना की आप की भौतिक जरूरतों को . इसलिए बच्चे को
भी साथ नहीं ले जाने पर अपमान महसूस होता है पर वह रोकर के या अन्य तरीके से इस
अपमान वाले भाव को व्यक्त करके बहुत जल्द हल्का हो जाता है . पर हम अधिक
शिक्षित(मायावी शिक्षा) होने पर अपमान के भावों को बाहर सबके सामने व्यक्त नहीं कर
पाते है और भीतर ही भीतर इन भावों को दबाने के कारण आगे चलकर कई प्रकार के रोगों
को जन्म देते है . क्यों की चाहे हम कितना भी ऊंचा पद प्राप्त करले या कितना भी
नीचा काम करले हमारे भीतर निरंतर एक सत्य चलता है जो हमे हर एक कर्म से पहले आगाह
करता है . जैसे चोर चोरी करता है तो भी उसकी आत्मा मन के माध्यम से यह कहती है की
तू यह गलत काम कर रहा है . फिर भी वह अपने संचित कर्मो के कारण चोरी कर बैठता है
और अंत में पश्चाताप करता है . परमात्मा ने यह माया हमारा मोह भंग करने के लिए
ही रची है . इसीलिए तो पग पग पर हम ठोकर खा रहे है और फिर से संकल्प करते है की अब
नहीं करूँगा और फिर कुछ समय बाद ही उसी खेत में जाने वाले रास्ते पर चलने लगते है
.
इसलिए
जब हमें अपमान की अनुभूति होती है तो आप इसे निम्न उदाहरण से आसानी से समझ सकते है
:
जैसे रमेश नाम का
व्यक्ति प्रधानमन्त्री है , और सुरेश और महेश
दो मित्र है . दोनों एक ही विभाग में कर्मचारी है . अब सम्मान समारोह में
प्रधानमंत्री ने सुरेश को पदक दे दिया और महेश को नहीं दिया . तो महेश की आत्मा कह
रही है की पिताजी (रमेश को) हम दोनों तो आपकी ही संतान है फिर आप ने आज हमारे भीतर
यह फर्क क्यों कर दिया और इतना कहकर महेश की आत्मा रोने लगती है . आत्मा को किसी
सम्मान की चाह नहीं है वह तो यह चाहती है की जिस प्रकार से रमेश ने सुरेश को लाड
प्यार किया है वैसे ही महेश की आत्मा भी चाहती है . क्यों की हम सभी भाई बहिन है
और हमारे सच्चे पिता केवल एक परमात्मा है .
फिर
हमारे पिताजी ऐसा क्यों करते है ?
क्यों की वे हमें
इतने मजबूत करना चाहते है की हम सभी प्रकार के मान सम्मानों से ऊपर उठकर केवल
निश्वार्थ भाव से सेवा करे .
इसलिए वे हमे
सीखा रहे है की जब एक क्रिकेट मैच में एक टीम जीतती है और दूसरी टीम हारती है तो
पहली टीम को तो सम्मान इसलिए मिलना चाहिए की उसने अच्छा प्रदर्शन किया है और साथ
ही हारने वाली टीम को भी बराबर सम्मान इसलिए मिलना चाहिए की उसने अपनी हार बड़ी ही
विनम्रता के साथ स्वीकार की है . यदि हारने वाली टीम हिंसा पर उतर जाती और अपनी
हार स्वीकार नहीं करती तो अब आप ही अंदाजा लगा लीजिये की यह सम्मान समारोह कैसा
होता ?
पुलिस की मौजूदगी
में होता है ऐसा सम्मान समारोह . क्या हम इस प्रकार से अपने जीवन को जीकर परमात्मा
को पा सकते है ?
कभी
नहीं .
हमारी इन्ही
गलतियों के कारण अखबारों में पढ़ने को मिलता है की अमुक व्यक्ति को डीजे पर नाचने नहीं दिया इसलिए उसने इसे
अपमान समझकर इसका बदला बाद में लोगों की हत्या करके लिया .
अब
मेरे कई मित्र इस उपरोक्त तर्क से सहमत नहीं होंगे ?
क्यों ?
परमात्मा से खुद
की दूरी का अहसास करने के कारण . अभी उन्हें यह पक्का विश्वास नहीं हुआ है की हम
सभी मित्र है और हमें यदि डीजे बजाना ही है तो खुद की ख़ुशी के साथ औरो की ख़ुशी का
भी ध्यान रखना है . या तो अपने घर में डीजे बजाये और इस प्रकार से प्रबंध करे की
औरो की नींद हराम ना हो . या फिर गलती के लिए परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहे .
क्यों की प्रकृति निष्पक्ष न्याय करती है . हम हमारी वासनाओं को इस तरह सबके सामने
व्यक्त नहीं कर सकते है . हमे सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाना चाहिए .
इसलिए
परमात्मा कह रहे है की मेरे प्यारे बच्चों क्यों छोटी छोटी बातों को लेकर झगड़ रहे
हो आप के पास तो ख़ुशी का समुद्र लबालब भरा हुआ है . एक नज़र भीतर की और डालों तो
सही फिर देखो कैसे मै आपकी झोली खुशियों से भर देता हूँ . धन्यवाद जी .
मंगल हो जी .
