सभी जीव यह बात नहीं कहते है . इसलिए उपरोक्त
कथन आंशिक रूप से ही सत्य है . जो आत्मा माया में बहुत गहराई से फसी हुयी है उसका
जीव रूप ही यह बात कहता है . अर्थात जीव अहंकार के कारण ऐसा बोलता है . पर जो जीव ऐसा कहता है उसको तो यह बात शत प्रतिशत सच लगती
है और वह ऐसा अनुभव कर चूका है उसके बाद कह रहा है .
जी हां . पर यह उसका
मायावी अनुभव है परमात्मिक अनुभव नहीं है . अर्थात जीव इन्द्रियों के माध्यम से जो
कुछ भी अनुभव करता है वह सब माया है .
फिर माया सच की तरह क्यों लगती है ?
क्यों की यह माया की स्वभाविक प्रकृति है जैसे पानी की
प्रकृति ठंडी और आग की गर्म .
पर यही जीव जब परमात्मा की इच्छा से अपनी आत्मा का अनुभव
करता है तो उसको एक ऐसी शांति का अनुभव होता है जिसे जीव शब्दों में बयान नहीं कर
सकता और अपनी सर्वव्यापकता का अनुभव करने के कारण पूरी दुनिया को खुद के प्यार भरे
अहसास के रूप में अनुभव करता है . फिर ऐसा आत्मज्ञानी जीव इस दुनिया को उपरोक्त
कथन से सम्बोधित नहीं करता है .
यधपि ऐसी आत्मा अभी अपने कर्मबन्धनों को काट रही होती है
(जीवात्मा के रूप में) फिर भी कष्टों को तटस्थ होकर एक एक करके काटती जाती है और
भयंकर पीड़ा में भी इस दुनिया को दोषी नहीं मानती है . और ऐसी जीवात्मा एक समय बाद
पूर्ण रूप से इसी दुनिया में स्वतंत्र हो जाती है हमेशा के लिए .
अब ऐसा जीव हर पल संतुष्ट रहता है .
आत्मा कर्मबन्धन में क्यों बंध जाती है ?
परमात्मा की इच्छा है की वह खुद को एक से अनेक रूपों में
प्रकट करके अपने आप में मस्त रहते है .
परमात्मा ने अहंकार भाव को प्रकट करके इस संसार को प्रकट
किया है . अर्थात सभी जीव अहंकारी है कुछ न कुछ मात्रा में .
तो फिर हम जीव भाव में रहकर खुश कैसे रहे हर पल ?
बहुत आसान है . आँखों से केवल वह सब देखो जिससे आप को
परमात्मा की तरफ बढ़ने में सहायता मिलती हो . अर्थात सुंदर सुंदर बगीचे , नन्हे नन्हे
बच्चे , नदियाँ , पहाड़ , प्यार भरा आकाश , मुस्कराता हुआ
चेहरा , पवित्र देव स्थान
.
ठीक इसी प्रकार से भोजन ऐसा करो जो आसानी से पच जाए . कुल
मिलाकर इन्द्रियों का सदुपयोग कैसे करे यह सिखाता है क्रियायोग ध्यान का अभ्यास .
क्या राग द्वेष को पूर्ण रूप से समाप्त किया
जा सकता है जीव भाव में रहकर ?
नहीं ?
क्यों की यदि जीव आँखों से कुछ भी नहीं देखेगा तो धीरे धीरे
आँखे परमतत्व में विलीन होने लगेगी . ठीक इसी प्रकार इस शरीर का अस्तित्व समाप्त
होने लगेगा यदि इस तंत्र से कुछ भी काम नहीं किया जायेगा . क्यों की यह शरीर तंत्र
मन से निर्मित होता है और मन का अस्तित्व इन्द्रियों के कारण है और इन्द्रियों का
अस्तित्व विषयों के कारण है और विषय परमात्मा की शक्ति का ही साकार रूप है .
इस प्रकार परमात्मा ही आत्मा का जीवन चक्र चलाते है .
क्रियायोग ध्यान के गहरे अभ्यास से यह सब आप को इसी शरीर
में रहते हुए अनुभव हो जाता है की मै कुछ भी नहीं कर रहा हूँ . पूर्ण लाभ की प्राप्ति के लिए इन लेखो को ज्यादा से ज्यादा
साझा करे . धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
