Swaroop Darshan

मन में आलस्य के भाव को स्फूर्ति के भाव में कैसे बदले ?

जब आप क्रियायोग
ध्यान का गहरा अभ्यास करते है तो आप को यह अनुभूति होती है की आलस्य भी एक प्रकार
की शक्ति ही होती है पर जब आप का मन इसे स्वीकार करने में सफल नहीं होता है तो आप
दुखी होने लगते है . क्यों की अभी आप मन में संचित प्रोग्रामिंग को समझने में सफल
नहीं हो रहे हो . ऐसा क्यों .

क्यों की आप इसे
बुद्धि से समझना चाहते है पर जब तक बुद्धि ही जाग्रत नहीं होंगी तब तक बुद्धि जो
भी तर्क करेगी वे सभी गलत साबित होंगे और आप आलस्य से हमेशा घृणा करते रहेंगे .
जैसे अभी आप को बहुत काम करना है पर बिस्तर से उठने का मन ही नहीं है तो क्या करे
?

आप नहीं उठने में
एकाग्र हो जाए और आप बार बार यह अभ्यास करे की यदि मै मेरे मन को यह निर्देश दू की
चलो आप मत उठो आप को जितना सोना है उतना सोलो . तो आप देखेंगे की जैसे ही इस
प्रकार के विचार आप मन में डालने की कोशिस करेंगे तो भीतर से आवाज आएगी की नहीं आप
ज्यादा मत सोवो नयी तो इतना काम कौन करेगा और काम नहीं करेंगे तो पैसा कहा से आएगा
और पैसा नहीं आएगा तो मै खुद खाना कैसे खाऊंगा या जो भी मेरी इच्छाये है उनको मै
पूरी कैसे करूँगा . क्यों की जिस प्रकार से आप की इच्छाये होती है वैसे ही सभी व्येक्तियों
की इच्छाये होती है आप दुसरो की इच्छा पूरी करने में जुटेंगे तभी वे आप की इच्छा
पूरी करेंगे . अर्थात जैसा हम बीज बोते है वैसा ही फल आता है . बैठे बैठे तो डूंगर
का भी अंत आ जाता है . अर्थात कर्म करना बहुत ही 
जरुरी होता है और आलस्य आता ही इसलिए है की आप का कोई ऐसा कर्म अब कटने जा
रहा है जो आप को यह सिखाना चाहता है है की 
भोजन कैसा करना चाहिए
, अपनी दैनिक
दिनचर्या कैसे होनी चाहिए . अर्थात जब तक आप प्राकृतिक जीवन की तरफ  अग्रसर होने का मन नहीं बनाएंगे तब तक आप के इन
अप्राकृतिक  कर्मो के कारण आप के और निराकार
शक्ति के बीच एक दूरी हमेशा बनी रहेगी जो हमेशा आलस्य को पोषित करती रहेगी . इसलिए
तुरंत अभी याद करे आप का सिर कहा है
, पैर कहा है अर्थात कुल मिलाकर  सिर से
लेकर पाँव तक में एकाग्रता का नियमित अभ्यास बहुत ही जरुरी है . अपने मन को शांत
स्थान में बैठकर जांचे आखिर अभी इसमें क्या क्या भाव उठ रहे है और केवल आप इन
भावों को देखे . आप धीरे धीर आलस्य की शक्ति को स्फूर्ति की शक्ति में कैसे बदले
इसके ज्ञान से जुड़ने लगेंगे . धन्यवाद
जी
. मंगल हो जी . 

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