जो राम भरोसे रहता है वह डूंगर पर भी हरा रहता है . प्रभु की लीला प्रभु ही जाने अर्थात रघुनाथ जी जाने . आप को और मेरे को तो प्रभु के गुणगान करने है . कभी नुक्सान लग जाए तो भी खुश ही रहना है और कभी ज्यादा लाभ हो जाये तो भी खुश ही रहना है .
मेरे या आप के संतान के रूप में लड़का हो या लड़की दोनों ही स्थितियों में हमारे को प्रसन्न रहना है . दोनों का महत्व शत प्रतिशत बराबर है .
यदि हम सच्चे अर्थो में हमेशा के लिए सुखी होना चाहते है तो जो है उसमे राजी होना सीखना पड़ेगा . अभी हमारा मन भूतकाल और भविष्यकाल में भटकता है . और मजे की बात यह है की इन दोनों का ही अस्तित्व नहीं होता है .
केवल वर्तमान का ही अस्तित्व है .
इसलिए हमें हरपल यही याद रखना है की जब भी कोई मुसीबत आ जाए तो कहे रघुनाथ जी जाने . बड़ी से बड़ी मुसीबत को हल करने के लिए रघुनाथ जी के होते हुए हमे परेशान होने की क्या जरुरत है .
जब भी मन करे रामधुनी करने लग जाए . यदि आप राम को नहीं मानते है और किसी अन्य भगवान को मानते है तो उनकी धुन में रम जाए .
क्यों की अंतिम सत्य तो यही है की केवल परमात्मा का अस्तित्व है . हम सभी भगवान के बच्चे है . इसलिए हमे एक दूसरे का सम्मान करना है .
हमारा मन भगवान में क्यों नहीं लगता है ?
क्यों की हम खुद को ज्ञानी समझते है .
जबकि सच तो यह है की हमारे करने से कुछ भी नहीं हो रहा है . बल्कि हमारा यह करना ही हमारे मन की शांति में बाधा पंहुचा रहा है .
जैसे आप को किसी बहुत बड़े सम्मान समारोह की अध्यक्षता करने के लिए निमंत्रण मिला है . और जब आप वहाँ पहुंचते है तो आप को पता चलता है की समारोह की अध्यक्षता कोई अन्य व्यक्ति कर रहा है . और आप को यह भी पता है की यह व्यक्ति समाज के लिए कुछ ज्यादा खास बाते नहीं रख पायेगा .
तो आप क्या करेंगे ?
यदि आप मन की शांति चाहते है तो खुद से केवल यह कहे ‘रघुनाथ जी जाने’.
फिर देखना क्या चमत्कार होता है .
पर यह सब पवित्र भावों से ही संभव होता है .
यदि हम कुछ भी पाने की लालसा रखेंगे तो हमेशा दुखी ही रहेंगे .
ऐसा क्यों होता है ?
ऐसा इसलिए होता है , क्यों की सबकुछ हमें पहले से ही मिला हुआ है . लेकिन हमारे अंधे मन के कारण हमारे पास कितना बड़ा खजाना है वह कभी दिखता ही नहीं है .
और इस मन को हमने खुद ने ही अँधा बनाया है .
ऐसा कैसे हो सकता है की हम खुद ही हमारे मन को अँधा बना देंगे ?
जी हां . यह शत प्रतिशत सच है . कैसे ?
जैसे हम कभी ऐसा भोजन खा लेते है जिसके खाने के बाद हमारी तबियत खराब हो जाती है . तो उस समय तो हम बहुत प्रकार के खुद से वादे करते है की आगे से ऐसा खराब भोजन नहीं खाऊंगा . और फिर कुछ दिनों बाद जब हमारी तबियत बहुत चंगी हो जाती है तो फिर हम खुद से किये गए वादे को भूल जाते है . और खुद के विचारों के कारण और मित्रों के कहने पर हम फिर से खराब भोजन खा लेते है . और फिर से तबियत खराब कर लेते है .
और यह सिलसिला जीवन भर चलता है . और हम कब प्रभु को पाने के अधूरे सपने के साथ इस पृथ्वी लोक से विदा हो जाते है . हमे खुद को ही पता नहीं चलता है .
यदि हम हर समय ये कहे की रघुनाथ जी जाने . तो खराब खाना खाने की नौबत ही नहीं आने देते है रघुनाथ जी .
अर्थात जब हम भगवान के साथ एक होकर बहने लगते है तो हमे अपने आप पता चलता है की मुझे जीवन में कहाँ जाना है .
और फिर इस सत्य की अनुभूति होती है की जीवन में कही जाना नहीं है बल्कि यहां वहाँ हम जो भटक रहे है वहाँ से वापस अपने रघुनाथ जी के पास (खुद के पास) आना है .
और ऐसा आप रघुनाथ जी से पूर्ण श्रद्धा के साथ कहो .
फिर देखों कैसे रघुनाथ जी दौड़कर आप के पास आ जाते है .
मेरे प्यारे साथियों भावों की पवित्रता ही जीवन में पवित्रता लेकर आती है . और यह पवित्रता सबकुछ भगवान पर छोड़ने पर ही संभव होती है .
हम चाहे कितनी भी लाख कोशिशे करले पर होगा वही जो मंजूरे खुदा है .
हमेशा माँ धरती को नमन करे .
पिता आकाश को नमन करे .
इस पुरे ब्रह्मांड को अपना सच्चा पिता मान ले .
खुद पर इतना विश्वास करे की चाहे आप की कितनी ही कीमती चीज आप को छोड़कर जा रही हो आप सिर्फ पुरे भावों के साथ यह कहे और महसूस करे की रघुनाथ जी जाने .
यदि आप भगवान में पूर्ण विश्वास रखते है तो फिर जो भी आप की इच्छा है वह शत प्रतिशत पूरी होगी . यह रघुनाथ जी की गारंटी है .
हम खुद ही हमारी खुशियों के बीच बाधा बनकर बैठे है . हम कभी बच्चो को सुधारना चाहते है तो कभी अन्य लोगों को . और कभी खुद को .
पर परम सत्य तो यह है की आप के करने से कुछ हो ही नहीं रहा है .
सबकुछ भगवान कर रहे है . और वे हरपल हमारी सुरक्षा कर रहे है .
कहते है न जाके राखो साईया मार सखे न कोई .
आप को केवल रघुनाथ जी के हुक्म का पालन करना है .
और उनका हुक्म केवल समर्पण भाव विकसित करना है .
अर्थात पहले खुद की सेवा फिर परिवार की सेवा और फिर पड़ौसी की सेवा फिर समाज की सेवा . इस प्रकार अपनी इस सेवा का विस्तार करे .
सेवा के बदले आप को क्या मिलेगा इसकी अभी आप कल्पना नहीं कर सकते है . इसका पता आप को मुसीबत के समय चलता है .
जब हम भगवान भरोसे हो जाते है तो फिर हमे हमारे सच्चे पिता निम्न ज्ञान अनुभव कराते है :
- कर्म क्या है ?
- कर्म कैसे करना है ?
- मन क्या है ?
- मन को कैसे समझे ?
- भाग्य क्या है ?
- सुख क्या है ?
- शांति क्या है ?
- दुःख क्या है ?
- माया क्या है ?
- पाप पुण्य क्या है ?
- बीमारी क्या है ?
- संसार क्या है ?
अर्थात भगवान् भरोसे होने पर सम्पूर्ण इच्छाओं की पूर्ति अपने आप हो जाती है .
इसलिए हरपल भगवान को इस प्रकार से याद करो की आप के इस मन और शरीर के माध्यम से खुद भगवान ही कर्म कर रहे है .
मेरे प्यारे साथियों यही परम सत्य है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
