एक बार एक जंगल में बहुत ही खूंखार डाकू रहता था . उसका अब तक का यह रिकॉर्ड था की यदि उसे किसी भी जीव को मारकर खाने की इच्छा हुयी तो वह जीव चाहे कितना भी छिपे या सामने आने पर गिड़गिड़ाए वह उसे गोली मार देता था . और फिर वह डाकू उस जीव को अपने जंगल में बने घर में लाकर उसका मांश पकाकर खा जाता था .
उसी जंगल में एक संत तपस्या करते थे . उन्होंने यह संकल्प ले रखा था की वह किसी से झूठ नहीं बोलेंगे . अर्थात वह संत सत्य और अहिंसा का पालन करते थे .
अब एक दिन अचानक भटकता भटकता एक व्यक्ति उस जंगल में आ गया . और उस खूंखार डाकू ने उस व्यक्ति को बहुत दूर से ही देख लिया .
अब आज वह खूंखार डाकू उस व्यक्ति का मांश खाना चाहता था . इसलिए वह डाकू उस व्यक्ति का शिकार करने के लिए उसके पीछे भागने लगा और जोर जोर से चिल्लाने लगा की रुको रुको तुम मेरे से बचकर इस जंगल से भाग नहीं सकते .
क्यों की मेने आज तक मेरे शिकार को जिन्दा नहीं छोड़ा है . इतना सुनने के बाद वह व्यक्ति पहले डरा पर फिर अपनी जान बचाने के लिए और तेज भागने लगा .
वह भागते भागते एक कुटिया तक पंहुचा . जहाँ वही संत कुटिया के भीतर तपस्या कर रहे थे . उस व्यक्ति ने संत को धीरे से आवाज लगाई . हे मुनिवर मेरे प्राण बचा लो . हे मुनिवर मेरे प्राण बचा लो .
हे मुनिवर मेरे प्राण बचा लो . ऐसे बार बार प्राण बचालो की आवाज सुनकर संत ध्यान अवस्था से उठकर कुटिया के बाहर आ गए .
और संत के कुटिया से बाहर आते ही वह व्यक्ति संत की कुटिया में भीतर जाकर छिप गया .
ऐसी परिस्थिति देखकर संत तुरंत समझ गए की अब मुझे क्या करना है ?.
अब संत कुटिया के बाहर ही कुछ काम करने लग गए . इतने में ही वह डाकू उस व्यक्ति को ढूंढता ढूंढता उस संत की कुटिया तक पहुंच गया . और संत से पुछा :
क्या महाराज आप ने अभी एक व्यक्ति को इस जंगल में भागते हुए देखा ?
तो संत ने कहा की जिसने उस व्यक्ति को देखा वह बोल नहीं सकता है और जो बोल रहा है उसने उस व्यक्ति को नहीं देखा . इसलिए मै आप की मदद नहीं कर सकता .
ऐसा सुनकर वह डाकू संत को धन्यवाद देकर वापस चला गया . और फिर कुछ समय बाद संत ने उस व्यक्ति को जंगल के दूसरे रास्ते से उसके घर तक छोड़ दिया .
जब वह व्यक्ति उस संत की छत्र छाया में अपने घर के लिए जा रहा था तो उसके मन में एक ही सवाल बार बार आ रहा था की आखिर संत ने ऐसा क्या किया की वह डाकू संत के जवाब से संतुष्ट होकर वापस चला गया . और संत ने मेरे प्राण बचा लिए .
उससे पूछे बिना रहा नहीं गया . इसलिए रास्ते में चलते हुए उसने संत से यही बात पूछी की हे मुनिवर आप ने मेरे प्राण कैसे बचाये . जबकि आप से तो उस डाकू ने मेरे लिए पूछा था और आप हमेशा सत्य वचन ही बोलते हो .
इस पर संत ने उस व्यक्ति से कहा की मेने उस डाकू से यह कहा था :
की मेरी आँखों ने उस व्यक्ति को देखा था पर आँखे बोल नहीं सकती है
और जो यह मेरा मुँह बोल रहा है वह देख नहीं सकता है
इस प्रकार संत ने सच भी बोल दिया और उस व्यक्ति के प्राण भी बचा लिए और डाकू को भी संतुष्ट कर दिया .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

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