Swaroop Darshan

हमारे भीतर ईर्ष्या , जलन , क्रोध , चिंता , डर के भाव क्यों जन्म लेते है ?

इन सब का उत्तर
भी इसी प्रश्न में छिपा है . मेने यहां
हमारे भीतर  
शब्द का प्रयोग किया है .
अर्थात यहाँ
हमारे
शब्द के पीछे अहंकार भाव छिपा है . बस यही
अहंकार भाव जलन
, क्रोध , चिंता , डर इत्यादि का वास्तविक कारण है . और यह कारण भी प्राकृतिक
है
, स्वाभाविक है , ईश्वर द्वारा इच्छित है . परमात्मा की योजना
(विधि का विधान) के कारण है .

जब आप क्रियायोग
ध्यान का पूर्ण विश्वास
, सच्ची श्रद्धा और
भक्ति के साथ अभ्यास करते है तो यह अहंकार भाव वास्तविक आनंद (परमानन्द
, परमात्मिक भाव, निश्वार्थ भाव) में रूपांतरित होने लगता है . और आप धीरे
धीरे स्थिरप्रज्ञ होने लगते है . फिर आप को यह अनुभूति होती है की सब कुछ अपने आप
हो रहा है . आप के शरीर के माध्यम से कर्म खुद निराकार शक्ति ही कर रही है .

मैंने भी मेरे कई
लेखों में लिखा है की आप कर्म करने के लिए स्वतंत्र है और अन्य लेखों में लिखा है
की आप स्वतंत्र नहीं नियंत्रित है . जब आप इन लेखों को बिना क्रियायोग के अभ्यास
से साधारण बुद्धि से समझने का प्रयास करेंगे तो आप को लेखों में द्वन्द की अनुभूति
होगी . इसलिए मै कहता हूँ की जब भी आप कुछ भी पढ़ते है
, या देखते है या सुनते है तो मन और बुद्धि के जाग्रत नहीं
होने के कारण आप सच को समझ नहीं पाते है और आप सही कार्य करने के बावजूद गलती कर
बैठते है .

जैसे आप ने किसी
की मदद की और आप को बदले में नुक्सान हुआ है तो आप अपने मन में यह भाव विकसित कर
लेते है की भले का बुरा होता है और फिर आगे आप की किसी को सच मे जरुरत होती है तो
मन को लगी पुरानी चोट के कारण अब आप सत्य कर्म करने से चूक जाते है और फिर से माया
में फस जाते है . इस प्रकार से ब्रह्म और माया का खेल चलता है और हम एक कठपुतली की
तरह नाचते रहते है .

यदि ऐसा न हो तो
हमारा यह दृश्य संसार भी नहीं रहेगा . अर्थात ईर्ष्या
, जलन , क्रोध , चिंता और डर के भावों में जब हम क्रियायोग
ध्यान के माध्यम से एकाग्र होने लगते है तो फिर यही भाव दिव्य ज्ञान में बदलने
लगते है . हमारी शक्ति बढ़ने लगती है . शांति बढ़ने लगती है . ये सभी भाव ज्ञान के
विभिन्न रूप है . इसलिए निरंतर क्रियायोग ध्यान का अभ्यास करना चाहिए . जैसे ही
कोई विचार दो को अलग करने का आये तो तुरंत सतर्क हो जाए . क्यों की यह मायावी
विचार होता है और हमारा नाश करने के लिए आता है . इसलिए जब आप से कोई राम राम
करे तो आप अपने मन को यह ट्रेनिंग दे की इसके रोम रोम में राम बसा है  . यह वही राम है जो कण कण में व्याप्त है पर
इसके नाम अनंत है . जैसे राम
, ईश्वर , अल्लाह , निराकार ,
परमात्मा , परम चेतना . पर इससे पहले आप को यह समझना पड़ेगा
की जब आप किसी से राम राम करते है तो पहले आप यह अनुभव करले की आप के रोम रोम में केवल
राम बसा है . एक सुई की नोंक के बराबर क्षेत्र में भी राम के अलावा दूसरा भाव न हो
.

महाभारत में जो
दुर्योधन ने कृष्ण से कहा था की मै पांडवो को पांच गाँव तो क्या एक सुई की नोंक
जितनी जगह भी नहीं दूंगा . जब आप क्रियायोग ध्यान का अभ्यास करेंगे तो इसका वास्तविक
अर्थ समझ में आएगा . यहां दुर्योधन अहंकार का प्रतीक है और पांडव धर्म का प्रतीक
है और अहंकार के पिता अंधे (धृत राष्ट्र या अंधा मन ) होने के कारण सही निर्णय
नहीं ले पाते है अर्थात हमारा मन जब तक परमात्मा से नहीं जुड़ता है तब तक अँधा ही
रहता है और इसी मन के अंधेपन के कारण हम ऊपर प्रश्न में दिए गए भावों की अनुभूति
करते है . इस प्रकार क्रियायोग ध्यान के अभ्यास से आप को इस संसार में कोई भी
बुराई नज़र नहीं आती है . इसलिए यदि आप पूर्ण स्वस्थ होना चाहते है तो अपने मन
को क्रियायोग ध्यान के अभ्यास से इस प्रकार से ट्रेनिंग दे की यह आप को हमारे
सच्चे पिता की तरफ ले जाने में सफल हो
. आप यह अभ्यास भी तभी कर पाएंगे जब आप हर पल केवल यही विश्वास करे की सब कुछ हमारे परम पिता कर
रहे है
. फिर आप देखेंगे की किस प्रकार से आप के जीवन में खुशियों की
बारिश होने लगेगी और आप हर पल खुश रहने लग जायेंगे. धन्यवाद
जी . मंगल हो जी .
 

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