हमारे अहंकार के
कारण . दो व्यक्ति जब एक
दूसरे के पास आते है तो इनके अहंकार के औरा आपस में टकराते है . परन्तु जब दोनों
व्येक्तियों के स्वभाव समान होते है तो फिर ऐसे व्यक्ति एक दूसरे के मित्र बन जाते
है . जैसे दो चोर समान स्वभाव के है और एक दूसरे के पास आयेंगे तो दोनों चोर मित्र
बनकर धीरे धीरे अपनी चोरों की मण्डली तैयार कर लेंगे और बहुत जल्दी ही एक बड़ी चोरी
की वारदात को अंजाम देने में सफल हो जायेंगे. इसका अंतिम परिणाम क्या होगा इसकी
भनक इस चोर गेंग को नहीं रहती है . क्यों की प्रभु किसी चोर के कर्म काटने के लिए
उसे सत्य के मार्ग पर चलना भुला देते है . पर यदि ऐसा चोर जिद्दी है तो वह फिर सच
का सामना करने से नहीं डरेगा और एक दिन वह सच्चा इंसान बन जायेगा .
ठीक इसी प्रकार
से जब दो ईमानदार व्येक्तियों का स्वभाव समान है तो ऐसे व्यक्ति एक दूसरे के पास
आयेंगे तो दोनों मित्र बन जायेंगे और धीरे धीरे ईमानदार व्येक्तियों का एक बड़ा
समूह तैयार हो जायेगा . और ऐसा समूह ही जो सत्य और अहिंसा के मार्ग से भटक गए है
उनको इस मार्ग पर लाने में सफल होता है . जैसे किसी महान संत की शरण में जाने
मात्र से आप के मन को शांति मिलने लगती है .
परन्तु जब आप
अपना स्वभाव इस प्रकार का विकसित करले की आप को जैसे देवता प्रिय होते है ठीक उसी
प्रकार से राक्षस भी प्रिये लगने लगे तो फिर आप उस तालाब की तरह बन जाते है जहा
बकरी और शेर एक साथ पानी पीते है . अर्थात आप के शरीर में देवता और राक्षस दोनों
विराजमान है . और आप इनके बीच में सम भाव में खड़े है . और इसी कारण से आप के शरीर
का अस्तित्व सुरक्षित रहता है .
पर जब हम सच का
सामना करते है तो हमारा अहंकार पिघलने लगता है अर्थात हमारा शरीर मरने लगता है
(नवीनीकरण की क्रिया) तो प्रभु की ही सरंक्षण की शक्ति(एक भाषा में इसे विष्णु
शक्ति के नाम से भी जाना जाता है ) के कारण हमें हमारे जीव भाव की अनुभूति होती
है. जिसे न्युटन नाम के व्येज्ञानिक ने सिद्ध करके बताया था . सच का सामना करने पर
हमें यह अहसास होता है की जैसे कोई हमारा खून चूस रहा हो , हमें पीट रहा हो , पुरे शरीर का ऑपरेशन होने लगता है . पर यदि हम क्रियायोग ध्यान का गहरा अभ्यास
करते है तो हम शरीर में निर्माण करने की शक्ति से जुड़ जाते है और साथ ही ऐसे ज्ञान
से भी जुड़ जाते है जो यह समझाता है की अब सच का सामना किस प्रकार से करना है .
इसीलिए सच को कड़वा बताया गया है और झूठ को मीठा बताया गया है . इसीलिए आज ज्यादातर
मित्रों को शुगर की शिकायत रहती है . यदि शुगर से पीड़ित व्यक्ति क्रियायोग ध्यान
का अभ्यास करने लग जाए तो धीरे धीरे शुगर हमेशा के लिए समाप्त हो जायेगी . इसलिए
शुगर के मरीज हमारे लिए परमात्मा का रूप है और इन्हे अपनी शुगर को इतना प्रेम करना
चाहिए जितना ये अपने इष्ट को करते है तो फिर चमत्कार होना शुरू हो जाते है . इसे
हमेशा याद रखे की परम शांति के लिए एक न एक दिन सच का सामना करना ही पड़ेगा . तो फिर देर किस बात की अपने दोनों हाथ उठाकर यह संकल्प करे
की हे मेरे प्रभु मै आज से आप के अलावा किसी अन्य का चिंतन नहीं करूँगा या करुँगी
और आज तक मैंने जो भी पाप कर्म किये है वे सब आगे से और करना छोड़ दिए है . सभी जीव
मेरे प्रिये मित्र है और मै सभी जीवों में आपको ही देखता हूँ या देखती हूँ
. धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
