दिखने में तो हम सब एक मनुष्य की तरह दिखते है यदि हमारे दो हाथ है , दो पैर है , एक सिर है ऐसे कुल मिलाकर हमारे शरीर की इस प्रकार की रचना को हम ज्यादातर लोग मनुष्य का शरीर मानते है . पर बहुत कम लोगों को यह पता है की वास्तविक रूप में हम मनुष्य तभी कहलाते है जब हमारे कर्म सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर किये गए हो . और इसका अनुभव क्रियायोग ध्यान के गहरे अभ्यास से होने लगता है . इसलिए अज्ञान के कारण हम इस पेट को एक खाने की मशीन समझ बैठे है और दिन रात इसमें कुछ भी डालते रहते है जैसे एक पशु करता है . फिर प्रकृति जिस प्रकार हम पेट के साथ व्यवहार करते है , हमे उसी प्रकार के परिणाम देती है .
जैसे पेट्रोल से चलने वाली कार में यदि हम दो हज़ार रूपय किलो वाला देशी घी भी डाल देंगे तो क्या वह कार स्टार्ट हो पायेगी ?
कभी नहीं .
ठीक इसी प्रकार यदि हम इस पेट को समझना चाहते है , यह कैसे कार्य करता है , इस पेट का उद्देश्य क्या है , इस पेट का निर्माण कैसे होता है तो फिर हमे इसके भीतर उतरना पड़ेगा और यह समझने का बार बार अभ्यास करना पड़ेगा की किस प्रकार के भोजन को इसके भीतर डालने पर हमारा यह पेट कैसी प्रतिक्रया देता है ?.
यही क्रियायोग ध्यान अभ्यास का एक हिस्सा है . अर्थात पेट को वास्तविक रूप में समझने की विधि को ‘क्रियायोग ध्यान पेट के लिए ‘ कहते है . यदि हमारे भीतर अपने स्वरुप का दर्शन करने के भाव बहुत तेजी से हिलोरे मार रहे है तो फिर हमे पेट को नज़र अंदाज करने का प्रकृति अधिकार नहीं देती है . यदि हम पूर्ण स्वस्थ होना चाहते है तो हमे यह ज्ञान भीतर से जगाना होगा की हमारे लिए किस प्रकार का पानी , भोजन इत्यादि जरुरी है ताकि हम हमेशा के लिए हमारे पेट को स्वस्थ रख सके .
हमने यह सीखा है की पेट केवल नाभि के चारो तरफ के क्षेत्र को ही कहते है . पर यह आंशिक सत्य है . पेट का क्षेत्र हमारे मुँह से शुरू होता है और नाभि के निचे तक जाता है .
इसीलिए तो जब हम भोजन को पूरी एकाग्रता के साथ खाते है तो भोजन का पाचन मुँह में ही शुरू हो जाता है और फिर धीरे धीरे लार के साथ मिलकर एक बहुत ही पौष्टिक तरल पदार्थ के रूप में मुँह से जुडी भोजन नली के माध्यम से छोटी आंत में जाता है .
जब भोजन मुँह में चबाया जाता है और यदि भोजन थोड़ा रूखा प्रकृति का है तो परमात्मा की रची गयी प्रकृति अपने आप उचित मात्रा में लार ग्रंथियों को स्त्रावित करती है और वह इस प्रकार की लार का निर्माण करती है ताकि भोजन का रूखापन हमारे मुँह के भीतर की मुलायम त्वचा को छील ना सके . अर्थात इस भोजन में यदि चिकनाई की कमी भी है तो ध्यान पूर्वक भोजन को चबाने के कारण आवश्यक चिकनाई की मात्रा उसी समय पैदा होने लगती है जब हम मुँह में भोजन के ग्रास को चबा रहे होते है .
तो क्या भोजन पकाते समय हमे घी या तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए ?
नहीं , इसका मतलब यह नहीं होता है .
अभी वर्तमान में हम जिस भाव दशा में जी रहे होते है अर्थात हमारी चेतना का स्तर क्या है उसके अनुसार ही हमे घी , तेल का प्रयोग करना होता है . जैसे कोई व्यक्ति रोज सो ग्राम तेल का प्रयोग कर रहा है और उसको पता ही नहीं है की यह तेल उसका पेट सही से पचा पा रहा है या नहीं . इसका पता केवल तभी चल पाता है जब यह व्यक्ति भोजन को ध्यानपूर्वक करने लग जाए . जैसे इस व्यक्ति को यह तो पता है की अमुक प्रकार के भोजन को खाने के बाद गैस बनेगी इसलिए यह पहले से ही दवा का इंतजाम करके रखता है और भोजन करने के बाद यह दवा खा लेता है . अब इसे यह विश्वास हो जाता है की अब गैस नहीं बनेगी .
पर हमने कभी यह गौर किया है की मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा ली . ऐसा क्यों हुआ ?
क्यों की हमने भोजन करने की सही विधि को नहीं समझा . हमे यह करना चाहिए की जब तेज भूख लगे तो अपनी सम्यक इच्छानुसार अपने भोजन का चुनाव खुद करे और फिर थाली में इतना ही भोजन पहली बार में ले जिसे आप बहुत ही सहजता से खा लेंगे और इतना भोजन ही खायेंगे की जैसे जैसे भोजन के स्वाद की अनुभूति धीरे धीरे कम होने लगे तो इसका हमे पता रहे. जब अंत में हमे यह अहसास हो जाए की अब थोड़ा ही भोजन खा पायेंगे तो उससे पहले ही भोजन करने की क्रिया को विराम दे दे . अर्थात हमने ऐसा करके हमारी भूख की हत्या नहीं करी है . बल्कि हमने सत्य और अहिंसा का पालन किया है . भोजन करने की इस क्रिया को सही से सम्पादित करने के लिए चाहे हमे थाली में दूसरी बार या तीसरी बार और भोजन लेना पड़े पर पहली बार में थाली में भोजन ज्यादा न भरे . क्यों की ऐसा करने से हम झूटन छूटने के डर से ज्यादा मात्रा में भोजन खा जाते है और फिर दिन भर परेशान रहते है .
भूख से कम खाने पर पेट में क्या क्या होता है ?
जब हम भूख से कम खाते है तो कई प्रकार के भोजन पेट में पाचन क्रिया के दौरान फूलने लगते है और कई प्रकार की गैसों का निर्माण होने लगता है जो भोजन को पचाने में हमारी मदद करती है . यदि इन गैसों का निर्माण नहीं होगा तो भोजन पचाने के लिए होने वाली रासायनिक क्रियाये बाधित होने लगती है और भोजन पेट में ही सड़ने लगता है . और इस भोजन को सड़ाने के लिए भी विभिन्न प्रकार की गैसों का निर्माण होता है . इसलिए हमे भूख से थोड़ा कम भोजन खाके कुछ समय (लगभग बीस मिनट) इन्तजार करना चाहिए ताकि हमे यह ज्ञान हो जाए की किस प्रकार का भोजन कितना फूलता है . यदि हम इस प्रकार से ‘क्रियायोग ध्यान भूख से कम खाना’ का अभ्यास पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ करेंगे तो एक समय ऐसा आता है की आप का पेट पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जायेगा . धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
