Swaroop Darshan

भगवान ने संसार क्यों बनाया है ?

भगवान ने संसार क्यों बनाया है ?  प्रश्न का उत्तर समझने से पहले हमे निम्न प्रश्नों का उत्तर वास्तविक रूप में समझना अनिवार्य है :

  • भगवान क्या है ?
  • भगवान कौन है ?

भगवान क्या है ?

कण कण में व्याप्त सत्ता को भगवान कहते है . अर्थात निराकार और साकार दोनों रूपों में .

भगवान कौन है ?

जब हम साकार रचना की बात करते है तो हम कण कण में व्याप्त सत्ता के ही एक गुण के कारण यह सत्ता खुद अपनी मर्जी से साकार रूप धारण कर लेती है और निरंतर परिवर्तनशील होती है . जैसे कोई मूर्ति या कोई इंसान के रूप को या किसी पर्वत इत्यादि को हम भगवान मानकर पूजते है . इन्हे हम भगवान कहते है . भगवान् की अनेक परिभाषाये है .

अब बात करते है की

भगवान ने संसार क्यों बनाया है ?

भगवान का ज्ञान अनंत है . और यह अनंत ज्ञान जब केवल निराकार सत्ता के रूप में ही छिपा रहता है तो इसका मतलब अभी यह बीज रूप में ही कण कण में व्याप्त है .
जब यह ज्ञान खुद यह कहता है की मै अनंत ज्ञानी हूँ(अर्थात भगवान का पहला अहंकार) तो अपनी खुद की इस बात को सही साबित करने के लिए अपने कुछ हिस्से को साकार रूप में बदल लेता है . और साथ ही अपना निराकार रूप भी नहीं छोड़ते है .
और खुद भगवान इसे हम सभी को निम्न उदाहरण से समझा रहे है :

जैसे एक गेहूँ का दाना यह कहे की मै बीज हूँ और मै अपने आप को एक पेड़ में बदल सकता हूँ . तो हम मेसे कौन यह मानेगा की यह गेहूँ का दाना जो बात कह रहा है वह सही है ?
जब तक यह बीज सिद्ध नहीं करेगा तब तक इसकी बात कोई नहीं मानेगा.

इसलिए भगवान इसे जब जमीन में गाड़ देते है और इसकी सेवा करते है तो यही गेहूँ का बीज एक पेड़ के रूप में बदलने लगता है . और इससे भगवान यह सिद्ध कर देते है की मै एक बीज से वृक्ष में रूपांतरित होने का ज्ञान रखता हूँ .

ठीक इसी प्रकार से बड़े रूप में यह पूरा संसार एक बीज से वृक्ष में रूपांतरित होने की ही भगवान की अभिव्यक्ति है . अर्थात खुद भगवान अपने आप को इस संसार के रूप में प्रकट कर रहे है .
और हम सभी जीव जंतु तथा सभी निर्जीव वस्तुओं के रूप में खुद भगवान् ही प्रकट हो रहे है .

जिस प्रकार से एक गेहूँ के बीज को पेड़ में रूपांतरित होने के लिए मिट्टी , पानी , प्रकाश , हवा , और आकाश की आवश्यकता होती है ठीक इसी प्रकार से एक इंसान के जन्म लेने और फिर इसके जीवन चक्र को आगे बढ़ाने के लिए माता – पिता , और पंच तत्व की आवश्यकता होती है .

अर्थात भगवान की ऊर्जा ही अनेक रूपों में प्रकट हो रही है .

फिर हमे इस संसार में सुख दुःख की अनुभूति क्यों होती है ?

क्यों की बीज से वृक्ष रूप में रूपांतरित होने की भगवान की यह क्रिया भी एक सच्चे ज्ञान को ही प्रकट कर रही है . अर्थात जब हम रोड़ पर ठोकर खाकर गिर जाते है(दुःख का अनुभव) और हम खुद उठने में सक्षम नहीं है तो उस समय हमारे भीतर यह ज्ञान प्रकट होता है की कोई मुझे खड़ा कर दे तो मै पहले की तरह चलने लग जाऊ(सुख का अनुभव) .

हमारे भीतर खड़ा कर दे यह ज्ञान भगवान क्यों प्रकट करते है ?

क्यों की जिस प्रकार एक छोटे बच्चे को जब उसकी माँ स्कूल में छोड़कर आती है तो यदि वहाँ बच्चे को पकड़ने के लिए अध्यापक नहीं होगा तो फिर वह बच्चा अपनी माँ के पीछे पीछे वापस घर आ जायेगा . और इस प्रकार से वह बच्चा शिक्षा ज्ञान से वंचित रह जायेगा . और फिर इस बच्चे का विकास वही रुक जायेगा .
अर्थात भगवान विद्यालय के माध्यम से बीज रुपी बच्चों को संस्कारित करके उनको खुद के जैसा ज्ञानी बना रहे है .

फिर भगवान खुद ही इन बच्चों को स्कूल के माध्यम से ज्ञानी बना रहे है तो फिर ये बच्चे अध्यापकों का कहना क्यों नहीं मानते है ?
जैसे गेहूँ का बीज यह कहे की मै मिटना नहीं चाहता हूँ पर आप मुझे पेड़ में बदल सकते हो . तो क्या यह संभव होगा ?
कभी नहीं .
गेहूँ के बीज को यह जिद्द छोड़नी पड़ती है यदि हम उसको आगे विकसित करना चाहते है तो . अर्थात हम गेहूँ के बीज को जमीन में गाड़ कर और उसकी सेवा करके इस बीज को यही तो समझा रहे है की तुम बीज केवल एक बीज तक ही सिमित नहीं हो . तुम्हारे भीतर बीज से पेड़ बनने की चमत्कारिक शक्ति छिपी हुयी है .

पर बीज को अपना अस्तित्व मिटने का डर लगता है . और यह डर लगना बहुत जरुरी है .
क्यों ?

क्यों की यदि बीज को यह डर नहीं रहेगा तो बीज अपने आप को बीज रूप में सुरक्षित नहीं रख पायेगा . क्यों की बीज का प्रयोग भगवान अपने इस संसार में रचनात्मक वस्तुओं को प्रकट करने के लिए कब करले यह भगवान् ही जाने .
मतलब भगवान गेहूँ के बीज से यह कह रहे है की मेने तुम्हे बीज रूप दिया है .

अब हो सकता है मै तुम्हारा प्रयोग किसी मेरे अन्य रूप की (जैसे कोई इंसान) भूख शांत करने के लिए करू या फिर एक से अधिक जीवों का पेट भरने के लिए तुम्हारे भीतर छिपी उस शक्ति का इस्तेमाल तुम्हारे को एक से अनेक बीजों में रूपांतरित करने के लिए करू .

इसलिए तुम अभी इस बीज रूप में ही बने रहो . अर्थात बीज अपने मालिक भगवान की आज्ञा का पालन कर रहा है . इसलिए जब कोई इसे जमीन में गाड़ने का प्रयास करता है तो इसे डर लगता है . की यदि मेरा अस्तित्व ही मिट जायेगा तो मै भगवान् को क्या मुँह दिखाऊँगा.

पर जब भगवान इस बीज को अपने सही उद्दैश्य का ज्ञान अनुभव कराते है तो फिर यह बीज अपने आप को अपने मालिक भगवान के लिए मिटा देता है . अर्थात बीज खुद को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है .

ठीक इसी प्रकार से यदि बच्चे को अध्यापक के भावों में वह सच्चा प्रेम दिखेगा जिसकी बदौलत बच्चा अपने आप को कुर्बान करके बीज से वृक्ष में बदलने के लिए राजी हो जायेगा तो फिर ऐसा बच्चा ऐसे अध्यापक का कहना शत प्रतिशत मानेगा ही मानेगा . अर्थात अब बच्चे को अध्यापक के आगे समर्पण करने में डर नहीं लगेगा .

इस प्रकार से भगवान् इस संसार में हमारे विविध रूपों में आकर निरंतर नवीन रचनात्मक कार्य कर रहे है .
अर्थात बीज को मिटने से जो डर लग रहा है उसको हम प्रकृति के माध्यम से उसकी सेवा करके खुद बीज को उसका महान ज्ञान अनुभव करा रहे है . और बीज इस महान ज्ञान की अनुभूति करके एक पेड़ के रूप में खिलखिला रहा है . अर्थात अब बीज का डर सच्ची ख़ुशी में बदल रहा है . मतलब बीज का सृजन हो रहा है .

मतलब इस पूरे संसार में भगवान की हर एक कृति निरंतर खिल रही है . संसार में मर कोई नहीं रहा है . वास्तव में यह मृत्यु लोक नहीं है बल्कि यह संसार तो सृजन लोक है . अर्थात हम सभी निरंतर एक दूसरे में रूपांतरित हो रहे है . यही तो हमारे भगवान् का बहुत सुंदर ज्ञान है .

इसलिए एक छोटे बच्चे को जब उसकी माँ स्कूल छोड़ने जाती है तो वहाँ उस बच्चे को सँभालने के लिए अध्यापक का रहना बहुत जरुरी है. अर्थात जब एक बीज को जमीन में बोते है तो उसकी खाद पानी के माध्यम से सेवा करना बहुत जरुरी है . वरना बीज जमीन के भीतर ही गलकर मिट्टी में बदल जायेगा .

यहाँ भगवान् हम बच्चों को यह समझा रहे है की यदि हम सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर यदि खुद को सेवा कार्यो के लिए समर्पित नहीं करेंगे तो हमारा हाल भी इस बीज की तरह ही हो जायेगा . अर्थात हमे बीज रूप में गड़कर खुद की और अन्य जीवों की तथा प्रकृति की सेवा करनी है . मतलब खुद को विकसित करना है .

इसलिए हम भगवान् के बच्चों को ‘भगवान ने संसार क्यों बनाया है’ इस प्रश्न का उत्तर वास्तविक रूप में समझने के बाद,   इस संसार को पवित्र दृष्टि से देखने का अभ्यास करना चाहिए . और यह सब स्वरुप दर्शन के अभ्यास से संभव होता है .

मतलब पहले खुद को जानों. संसार से भागों मत जागो.
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

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