आज मेरे प्यारे मित्रों परमात्मा की कृपा से मै आप को परमात्मा का वह राज समझाने जा रहा हूँ जिसे यदि आप पहले विश्वास करके समझने में कामयाब हो जाते है तो फिर आप के जीवन का सफर अपने आप बहने लगेगा .
हम सभी इस सांसारिक जीवन में कष्ट क्यों पाते है ?
क्यों की हम सभी जीव और सभी निर्जीव आपस में भातर से जुड़े हुए है पर परमात्मा की माया के प्रभाव के कारण हम बाहर से जुड़ने की गलती कर बैठते है . और फिर यही गलती बार बार दोहराने के कारण सच की तरह लगने लगती है .
जैसे आप किसी को अपना मित्र इसलिए मानते है की उस मित्र से आप के विचार मेल खाते है .
पर कभी आप ने यह करके देखा है की उस मित्र का आप दो चार बार कोई काम मत करो , क्या फिर भी वह आप को उतना ही सच्चा मित्र मानेगा ?
कभी भी नहीं .
ऐसा क्यों होता है ?
क्यों की आप दोनों मित्र ही अपनी आत्माओं को भूलकर अपने आप को शरीर मानकर यह मित्रता इतने समय से निभाते आ रहे थे .
अर्थात आप दोनों मित्र भौतिक वस्तुओ को आधार मानकर एक दूसरे से जुड़े हुए थे . और आप को पता है की इस संसार में कोई भी वस्तु हर समय एक जैसी नहीं रहती है .
जैसे आप का खुद का मूड दिन में कई बार बदलता रहता है . अर्थात आप का शरीर और आप के मित्र का शरीर जैसे इस समय दिख रहे है वैसे हर समय नहीं रहते है . हमारा शरीर प्रतिक्षण बदल रहा है .
और हम सभी संसार में भौतिक वस्तुओं को सच मानकर जीवन जीते है .
इसीलिए किसी व्यक्ति को विरासत में मिली जमीन समय के साथ कई बार कम पड़ जाती है . और वह व्यक्ति अपनी जमीन को पूरा करने के लिए पूरी उम्र कोर्ट कचहरी में चक्कर काटता रहता है और अंत में जमीन पूरी हो या नहीं वह व्यक्ति इस संसार से पूरा अवश्य हो जाता है .
व्यक्ति के साथ ऐसा क्यों होता है ?
क्यों की हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से भीतर से इस प्रकार से जुड़ा हुआ है जैसे गुलाब से खुशबू .
जैसे रामू और श्यामू दो दिखने में तो अलग अलग व्यक्ति है . और दोनों एक दूसरे को शरीर मानकर एक दूसरे से मित्र या शत्रु के रूप में जुड़े हुए है .
अर्थात यदि रामू श्यामू को अपना मित्र समझता है तो अवश्य ही रामू श्याम से कई प्रकार की अपेक्षाएं रखता है . और जब श्यामू इन अपेक्षाओं को पूरा नहीं करता है तो रामू को क्रोध आता है .
ऐसा क्यों होता है ?
क्यों की रामू और श्यामू पहले से भीतर से इस प्रकार से जुड़े हुए है जैसे गुलाब से खुशुबू . अर्थात वास्तविक रूप में रामू और श्यामू के बीच दूरी शून्य है . क्यों की रामू और श्यामू की आत्मायें परमात्मा से प्रकट हो रही है और कण कण में केवल परमात्मा का ही अस्तित्व है . पर परमात्मा कण कण में अलग अलग रूपों में प्रकट हो रहे है . जैसे यहां रामू और श्यामू के रूप में .
अब रामू और श्यामू में आपस में झगडे का यह खेल निम्न प्रकार से शुरू होता है :
रामू और श्यामू दोनों एक दूसरे को केवल सांसारिक जीव समझते है अर्थात ये दोनों केवल जीव भाव में जीते है और कभी कभी आत्म भाव की अनुभूति होने पर इनको एक दूसरे पर शक होने लगता है .
क्यों होता है एक दूसरे पर शक ?
क्यों की जब रामू और श्याम जैसा दिख रहा है वैसा इनके लिए सच होता हुआ दिखाई नहीं देता है तो फिर इनका एक दूसरे पर से विश्वास उठने लगता है . जैसे रामू ने श्याम को दो दिन में दस हज़ार रूपये उधार देने का वादा कर लिया है .
अब रामू को जिससे दस हज़ार रूपए लेने थे उस व्यक्ति को किसी अपराध के कारण पुलिस उठाकर ले गयी . अब जैसे ही रामू इस व्यक्ति के पास पैसे लेने के लिए घर जाता है तो इस व्यक्ति के नहीं मिलने के कारण रामू खाली हाथ वापस अपने घर लौट आता है .
अब इतने में ही श्यामू रामू के पास पैसे लेने आ जाता है . और रामू पैसा नहीं दे पाता है. इस कारण अब श्यामू नाराज़ हो जाता है .
रामू और श्यामू जैसा खेल इस संसार में ज्यादातर सभी लोगों के साथ हो रहा है . कोई बिरला ही होगा जो निश्वार्थ मित्रता करता है .
निश्वार्थ मित्रता वही करेगा जो अपनी आत्मा की अनुभूति करता है . क्यों की जो व्यक्ति सच में अपनी आत्मा की अनुभूति करने में सफल हो जाता है उसे फिर यह भी अनुभूति हो जाती है की मेरी ही आत्मा सभी जीवों में व्याप्त है .
अर्थात ऐसा व्यक्ति सभी जीवों से भीतर से जुड़ाव को महसूस कर लेता है .
अब यदि उपरोक्त उदाहरण में रामु और श्यामू सच्चे मित्र होते तो रामु के दस हज़ार रूपये नहीं देने पर भी श्यामू नाराज़ नहीं होता और साथ ही यह कहता की अरे रामु चल कोई बात नहीं तेरे पास पैसो का इंतजाम नहीं हुआ है तो . जब तूने मुझे पैसे देने का वादा कर लिया था और तेरे पास उस समय दस हज़ार रूपये नहीं थे . तूने तो किसी और के भरोसे मुझे पैसे देने का वादा कर लिया था .
पर मेरे जिगरी दोस्त रामु जिस व्यक्ति ने तुझे दस हज़ार रुपये नहीं दिए उस घटना ने तुझे और मुझे दोनों को एक बहुत ही अच्छी शिक्षा भी दे डाली है .
वह शिक्षा यह है की जब हमारी खुद की जेब में दस हज़ार रूपये हो तभी किसी को मदद का भरोसा करना चाहिए .
किसी और के भरोसे मदद का विश्वास किसी को भी नहीं देना चाहिए .
यहां रामु उस व्यक्ति से बाहरी रूप से दुबारा जुड़ गया जिससे दस हज़ार रूपये लेने थे . जबकि रामु उस व्यक्ति से भीतर से पहले से ही जुड़ा हुआ था .
जो बाहरी रूप से जुड़ा है वह रामु और उस व्यक्ति का मायावी रूप है . जो हर समय बदल रहा है .
इसलिए जब भी हम किसी से भी या खुद से भी बाहरी रूप से अर्थात शरीर भाव में जुड़ते है तो फिर हमें कष्ट होते है .
क्यों की जो दृश्य हम देख रहे है वह जैसा दिख रहा है वैसा सच में नहीं है . सच तो यह है की खुद परमात्मा उस दृश्य के रूप में प्रकट हो रहे है .
इसलिए हमे केवल जीव भाव में रहकर इतना ही जुड़ना चाहिए जितने में इस जीव की रक्षा हो सके .
जैसे मै इसे एक उदाहरण से समझाता हूँ :
जैसे आप से किसी प्यासे व्यक्ति ने पिने का पानी माँगा तो यदि आप उस व्यक्ति को पानी पिलाने में समर्थ है तो आप के जीव भाव के लिए ठीक इतना ही रहेगा की आप एक प्यासे व्यक्ति से पानी के माध्यम से जुड़ रहे है . और जब आप ने पानी पिलाने की क्रिया पूरी कर दी तो अब यदि आप इस व्यक्ति से फिर भी आगे जुड़ने की कोशिश बिना जरुरत के करते है तो फिर आप को कष्ट उठाना पड़ेगा .
क्यों की अब या तो आप इससे फालतू बाते करेंगे या फिर आप की फालतू बातों से यह व्यक्ति प्रभावित होकर खुद भी फालतू बाते करने लग जाए . या कुछ भी अपेक्षाएं आप दोनों पालने लग जाए .
इसलिए हमें मजाक के समय ही मजाक करनी चाहिए ताकि हमारे मन का भी मनोरंजन होता रहे . पर हम चाहे की हर समय मजाक करना ठीक है तो फिर यह मजाक करना हमारे को मुशीबत में डालेगा .
इस प्रकार आज इस लेख के माध्यम से हमने समझा की हर किसी से कितना जुड़ना चाहिए और क्यों जुड़ना चाहिए .
यदि आप को इस लेख को पढ़ने के बाद अपने जीवन में उतारने से फायदा होता है तो आप कमेंट करके मुझे अवश्य बताये ताकि किसी जरूरतमंद का हौसला बढे .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

