मेरे प्यारे साथियो आप अकेले नहीं हो इस संसार में . जीवन में कभी भी इस विचार को स्वीकार मत करना की आप अकेले हो . क्यों की आप परमात्मा की संतान हो और आप आत्मा हो .
वे सभी गुण जो परमात्मा में है वे ही गुण आप में भी है . यह पूरा संसार आपका मित्र है .
फिर आप को इस संसार में कोई अपना प्रिय और सच्चा मित्र क्यों नहीं मिलता है ?
क्यों की आप खुद को शरीर मानते हो आत्मा नहीं .
और जब तक आप खुद को शरीर मानेंगे तब तक आप खुद ही समझे की आप की आत्मा के गुण भीतर से बाहर कैसे प्रकट होंगे .
जैसे आप को यह लगता है की आप की तरक्की से अमुक व्यक्ति जलता है तो यह सिर्फ आप का वहम है .
आप से इस संसार में कोई कैसे जल सकता है जब जीव जीव भगवान है . अर्थात वास्तविक सत्य तो यह है की जिस व्यक्ति को आप अपना शत्रु मान रहे है वह सत्य रूप में आप का परम मित्र है .
पर आप की आत्मा के ऊपर मन के माध्यम से किये गए अप्राकृतिक कार्यो की कालिख जमा होने के कारण आप इस सच्चाई को अनुभव नहीं कर पा रहे हो .
अर्थात जैसे गंदे पानी में पेंदे में रखी हुयी चीज दिखाई नहीं देती है ठीक इसी प्रकार से जब हम आत्मा में नहीं जीकर शरीर भाव में जीते है तो फिर माया के प्रभाव के कारण खुद में और दुसरो में भगवान को नहीं देख पाते है .
अर्थात जब तक आप मन के चश्मे से खुद को और इस संसार को देखेंगे तब तक आप अशांत रहेंगे .
और जब आप सबसे पहले यह विश्वास करले की मै शरीर नहीं हूँ बल्कि मै तो आत्मा हूँ . तो पहला चमत्कार यह होगा की आप को यह अनुभव होने लगेगा की कोई और शक्ति है जो मेरी रक्षा कर रही है .
खुद को आत्मा मानने का विश्वास करने के लिए आप को स्वरुप दर्शन का अभ्यास करना बहुत जरुरी है .
इसके लिए सबसे पहले आप वर्तमान में जीने का अभ्यास करे .
अपनी श्वास पर ध्यान लगाए
हमेशा कमर सीधी करके बैठे और मन में उठने वाले हर विचार के प्रति जाग्रत रहे .
यदि आप के मन में यह विचार आये की यह व्यक्ति मेरे साथ धोखा करेगा तो आप उस व्यक्ति से शत्रुता के भाव न रखकर बल्कि उसे भीतर ही भीतर इतना प्रेम करे जैसे आप अपने इष्ट देव को करते है . और इस विचार से कहे भाई आप से मेरा विनम्र निवेदन है की आप मेरे ईश्वर है इसलिए आप इस धोखा रूप को छोड़कर प्रेम रूप धारण करले .
जब भी मन में कोई नकारात्मक विचार आये तो उसे कहे प्रभु अब तो अपने असली रूप में आ जाओ मुझे कब तक तड़पाओगे .
प्रभु आप की परीक्षा लेते है इस मन के माध्यम से .
अर्थात जैसे कोई पिता अपने बच्चे को एक ऐसे खेल में भेज दे जिसमे बच्चा जाकर उस खेल में ही फस जाए तो अब आप ही बताइये की वह बच्चा क्या करेगा ?
- या तो वह अपने पिता को पुकारेगा
- या पहले खेल में से खुद निकलने का प्रयास करेगा
- या हार मान लेगा तो पिता खेल में से निकालकर ले जायेंगे
ठीक इसी प्रकार से आप को परमात्मा ने मन रुपी खेल में भेज दिया है आप की आत्मा को शरीर के रूप में बांधकर .
अर्थात आप खुद आत्मा हो पर शरीर में बंधी होने के कारण आप को इसकी अनुभूति नहीं हो रही है .
आप अपनी आत्मा की अनुभूति तभी कर सकते है जब हमारे प्रभु की इच्छा हो . और प्रभु की इच्छा तभी होती है उस इंसान के लिए जिसके भीतर से सभी जीवों के लिए प्रेम भाव उमड़ रहा हो .
क्यों की परमात्मा केवल प्रेम की भाषा में ही बात करते है .
आप ने कई जगह देखा होगा या सुना होगा या आप खुद कर रहे होंगे की जैसे कोई इंसान अपने आप को कमजोर समझता है और अपने आप को शक्तिशाली बनाने के लिए कई प्रकार के प्रेरणादायक वीडियो देखता है , किताबे पड़ता है , चाहे ये मेरे लेख पढता हो और फिर ऐसा करके इस ज्ञान के अनुसार अपने आप को बदलने लगता है . और फिर भी मन शांत नहीं रहता है .
जब व्यक्ति इतना परिश्रम करता है फिर भी मन शांत क्यों नहीं रहता है ?
क्यों की जो मन अकर्ता भाव से ही शांत होता हो वह भला कर्ता भाव से कैसे शांत होगा ?
अब कर्ता भाव के निम्न उदाहरण है :
- मै बड़ा हूँ और आप छोटे है
- मुझे आप से ज्यादा ज्ञान है
- मै अमीर हूँ और आप गरीब हो
- मै ऊँची जाती का हूँ और आप नीची जाती के हो
- मै स्वस्थ हूँ और आप बीमार हो
- मै ताकतवर हूँ और आप कमजोर हो
ऐसे जितने भी अहंकारी भाव हम खुद हमारे मन की सहायता से विकसित करते है ये सभी कर्ता भाव कहलाते है . इसलिए जब तक हम इन सभी कर्ता भावों को अकर्ता भावों में बदलने का अभ्यास नहीं करेंगे तब तक हमारा मन अशांत ही रहेगा .
हम कैसे अपने आप को कर्ता भाव से मुक्त रखे ?
स्वरुप दर्शन का अभ्यास करके . जी हां . मै यहां आप को स्वरुप दर्शन के अभ्यास के कुछ अंश बता रहा हूँ :
- छिपकर किसी की बात ना सुने . वरना धीरे धीरे बहरे होने लगेंगे और मन अशांत हो जायेगा
- गंदे दृश्य ना देखे . वरना धीरे धीरे अंधे होने लगेंगे
- किसी की निंदा , बुराई , चुगली ना करे . वरना धीरे धीरे मुँह से बोलने की क्रिया गड़बड़ाने लगेगी
अर्थात मन से या शरीर के किसी भी अंग से आप कोई भी गन्दा काम करेंगे तो फिर उस मन का या शरीर का अंग खराब होने लगता है .
जैसे आप ने किसी लंगड़े व्यक्ति को देख लिया और फिर आप के पुराने स्वभाव के कारण आप भीतर मन में या बाहर किसी को यह बोलते है की इसके कर्म ही ऐसे है जिससे यह व्यक्ति लंगड़ा हो गया है . और देखो मेरे कर्म कितने अच्छे है मै तो लंगड़ा नहीं हुआ .
तो यदि आप समय रहते आप के इस स्वभाव को नहीं बदलेंगे तो आप का यही स्वभाव आप को लँगड़ेपन में बदल देगा .
तो फिर आप ही बताइये की ऐसे स्वभाव में जीकर हम मन को शांत कैसे कर सकते है .
एक तरफ तो हम कहते है की मै भगवान की संतान हूँ . तो फिर वह लंगड़ा व्यक्ति भी तो भगवान की ही संतान है . इसका मतलब वह लंगड़ा व्यक्ति हमारा मित्र है .
फिर हम हमारे मित्र को लंगड़ा कैसे कह सकते है .
हमारे प्रभु हमारी इसी सोच की परीक्षा लेने के लिए कभी लंगड़े व्यक्ति के रूप में तो कभी किसी भिखारी के रूप में हमारे सामने आ जाते है . और हम हमारे स्वभाव के कारण उनको पहचान नहीं पाते है .
और फिर से एक बार गलती कर बैठते है .
अर्थात हम हमारे परमात्मा के हाथों की कठपुतली मात्र है . पर परमात्मा की माया के प्रकोप के कारण हमें यह लगता है की हम खुद कर्म कर रहे है .
प्रभु हमसे केवल इतना ही चाहते है की जब वे खुद ही हमारी आत्मा को मन के बंधन से खोल रहे है तो हमे शांति से उनके इन कर्मबन्धनों को खोलने की क्रिया के दौरान होने वाले सभी परिवर्तनों को एक द्रष्टा की तरह देखना मात्र है .
यदि हम प्रभु की इस योजना में बाधा(मै का भाव) बनकर खड़े रहेंगे तो फिर हमारा मन कभी भी शांत नहीं होगा .
इसीलिए तो हमारे प्रभु हमारे से आत्मा की आवाज के रूप में यह कह रहे है की मेरे बच्चे तू केवल मेरा ही ध्यान कर .
और आगे प्रभु कहते है की इसके लिए तुम अपने स्वरुप के दर्शन का अभ्यास करो .
इसलिए अपने स्वभाव को बदलने के लिए बार बार अपने आप को मन में यह याद दिलाये की मै प्रभु का प्यारा बच्चा हूँ और सामने वाला भी प्रभु का ही प्यारा बच्चा है .
ऐसा बार बार अभ्यास करने पर धीरे धीरे आप का मन शांत होने लगेगा .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

