हमारे प्रभु हमे ढूंढते ढूंढते हमारे पास आ रहे है और हम भी हमारे प्रियतम को ढूंढते ढूंढते उनके पास ही जा रहे है . ताकि प्रभु से हम ख़ुशी की दवा ले सके .
- फिर हमे हमारे प्रभु दिख क्यों नहीं रहे है ? .
- वे ऐसे ही आँख मिचोली कब तक करते रहेंगे ?
- हमें यह क्यों लगता है की जब वे ही हमारे सच्चे माता पिता है तो फिर उनके बच्चे इतने कष्ट क्यों पा रहे है ?.
इन प्रश्नों का वास्तविक उत्तर यह है की हम जोश में होश खो बैठते है . इसलिए कैसे हम अपने आप को संभाले , इसके लिए हमारे प्रभु आज ‘ख़ुशी की दवा’ लेकर आये है .
जैसे हम कहते है की किसी की निंदा मत करो . मुझे निंदा करना पसंद नहीं है . पर जब हम किसी के पास बैठते है और वह व्यक्ति हमारे साथ बैठकर किसी अन्य व्यक्ति की निंदा करना शुरू कर देता है .
अब हम यही तो करते है की पहले तो उसे समझाते है की भाई तू मेरे सामने किसी की निंदा मत करा कर .
जब वह व्यक्ति हमारे समझाने के बाद भी निंदा करना नहीं रोकता है तो हम वहाँ से उठकर चले जाते है .
अब हमने यहाँ तक तो ऐसा करके ठीक किया है और ऐसा करने से हमारे प्रभु हमारे पास आने लगते है .
पर जब यही बात हम किसी हमारे हितेषी (सच्चा मित्र , माता पिता , पत्नी या अन्य ) को किस भाव से कहते है उस पर निर्भर करता है की अब हमारे प्रभु अभी भी हमारे पास ही आ रहे है या वे हमारे पास आने से रुक गए है .
जैसे हम इस घटना को हमारे हितेषी को यह कहकर शुरू करते है की कल में उस अमुक व्यक्ति के पास बैठा था . पर मुझे उसके पास बैठना अच्छा नहीं लगता है क्यों की वह हर समय दुसरो की निंदा करता रहता है .
और आप आगे यह भी कह रहे है की किसी को ऐसे व्यक्ति के पास नहीं बैठना चाहिए . यह व्यक्ति मेरी नज़र में ठीक नहीं है . इसके जीवन में कभी शांति नहीं आएगी . यह व्यक्ति लोगों की निंदा कर कर के दुखी होता जायेगा . और आप यह सभी बाते इस अमुक व्यक्ति के लिए अपने प्रियजनों को बैचारे के भाव से कहते है .
अर्थात आप के भीतर इस व्यक्ति के प्रति दुखी होने वाले भाव बहुत ही सूक्ष्मरूप में आप की खुद की जागरूकता की कमी के कारण पैदा हो रहे है .
इसलिए वास्तविक रूप में आप खुद इस व्यक्ति की निंदा ही कर रहे है . और आप को लग यह रहा है की मै तो बहुत अच्छा इंसान हूँ इसलिए निंदा करने वाले व्यक्ति के पास नहीं बैठता हूँ .
आप वहाँ से शरीर से ही उठकर आये है जो की हम सभी को दिखाई दे रहा है .
पर सच यह है की आप का मन अभी भी उसी निंदा करने वाले व्यक्ति के पास ही बैठा है .
और आश्चर्यचकित कर देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है की यदि मै खुद भी आप की इस बात से परेशान हो रहा हूँ तो फिर मै भी आप ही की तरह आप की निंदा कर रहा हूँ .
तो फिर आखिर आप करे क्या जब आप के पास कोई व्यक्ति किसी की निंदा करे ?
बहुत आसान है . आप स्वरुप दर्शन का अभ्यास करे . निंदा करने वाले व्यक्ति में भी अपने प्रभु को ही देखे . क्यों की हमारे प्रभु कण कण में व्याप्त है .
पहले आप निंदा करने वाले व्यक्ति से यह कहे की भाई मेने निंदा करना छोड़ दिया है और हमारे प्रभु को पकड़ लिया है . तू भी निंदा करना छोड़ दे . तेरी भलाई भी इसी में है .
यदि आप के ऐसा कहने पर भी वह निंदा करने से नहीं रुकता है और आप वहाँ से उठ भी नहीं सकते तो फिर आप को चुप रहने का अभ्यास करना चाहिए .
और यदि आप वहाँ से उठ जाते है और अब आप का मन बार बार इस बात को अपने प्रियजनों को बताना चाहता है तो फिर आप इसे निम्न प्रकार से बताये :
आप अपने प्रियजनों को यह कहे की आज तो हमारे प्रभु ने मुझे निंदा करने वाले व्यक्ति के रूप में आकर मुझे दर्शन दिए थे . प्रभु का वह रूप मुझे बहुत प्यारा लग रहा था . मेने उस रूप में आये प्रभु को पहले समझाया भी बहुत था . पर प्रभु ने कहा की मेरे प्यारे बच्चे अब आप अपने हितेषियों के पास जाओ और मुझे मेरी लीला का आनंद लेने दो .
और प्रभु के ऐसा कहने पर ही मै आप लोगों के पास आया हूँ . अगर आप ने ऐसा कर लिया तो फिर आप के भीतर से एक ख़ुशी प्रकट होगी . यह ख़ुशी आप को निंदा भाव को प्रेम भाव में बदलने के अभ्यास के कारण अनुभव होती है . और ऐसा अनुभव आप केवल नियमित रूप से अभ्यास करके ही महसूस कर सकते है .
आप को ख़ुशी तभी अनुभव होती है जब आप का मन किसी भी दृश्य या किसी स्वाद या किसी गंध या किसी आवाज में रूचि लेता है .
पर मन की यह रूचि स्थायी नहीं रहती है क्यों की वह दृश्य या स्वाद या गंध उसी तीव्रता में हर समय नहीं रहती है . हर दृश्य और अदृश्य वस्तु निरंतर बदल रही है . और हम भी निरंतर बदल रहे है . पर विष्णु शक्ति के कारण (सुरक्षा की शक्ति अर्थात जड़त्व का नियम) हमारा मन एक बार किसी चीज में रूचि लेने लगता है तो मन बार बार यही चाहता है की मुझे यह रूचि लगातार मिलती रहे .
पर वास्तविक सत्य तो यह है की मन का खुद का कोई अलग से अस्तित्व ही नहीं होता है . मन तो खुद ही प्रभु से प्रकट हो रहा है . और हमारा मन निरंतर बदल रहा है . और ये मन के सभी बदलाव प्राकृतिक है .
अर्थात सबकुछ प्रभु कर रहे है . पर प्रभु इसे इस प्रकार से कर रहे है की हमे यह लगता है की हम खुद यह सब कर रहे है .
हमे ऐसा क्यों लगता है ?
हमें ऐसा अनुभव कराना प्रभु की इच्छा के कारण होता है .
जैसे गेहूँ के बीज को जमीन में बोने पर इसका जो पौधा तैयार होता है उसकी सरंचना का एक विशेष रूप होता है और बाजरे के बीज से जो पौधा प्रकट होता है उसकी गेहूँ के पौधे से अलग सरंचना होती है .
अब यदि हम यह प्रश्न करे की गेहूँ और बाजरे के पौधे बिलकुल एक जैसे क्यों नहीं दिखते है ?
यदि दोनों पोधो की सरंचना शत प्रतिशत एक जैसी हो जाएगी तो फिर हम गर्मी के मौसम में गेहूँ कैसे खा पायेंगे और सर्दी में बाजरा कैसे खा पायेंगे .
अगर ऐसा होने लगा तो फिर यह संसार ही लुप्त हो जायेगा . हम खुद भी अदृश्य हो जायेंगे .
इसलिए हमे सभी प्रकार के दृश्यों , गंध , स्वाद इत्यादि का सम्मान करना चाहिए . शरीर में होने वाले सभी परिवर्तनों का ख़ुशी के साथ सम्मान करना चाहिए .ऐसा अभ्यास करके आप धीरे धीरे प्रभु से जुड़े हुए हो इसका अहसास करने लगेंगे . और फिर आप धीरे धीरे हर पल खुश रहने लगेंगे .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

