आज मेरे प्रिय मित्रों हमारे प्रभु ज्योतिष और आयुर्वेद को विस्तार से समझा रहे है . हमें पूरा विश्वास है की आज के इस लेख को यदि आप सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ पढ़ते है तो फिर आज तक के आप के मन में जो ज्योतिष और आयुर्वेद को लेकर जितने भी प्रश्न है या जो भी आप के मन में शंकाये है उनका वास्तविक उत्तर आप को इस लेख को गहराई से समझने पर मिल जायेगा .
ज्योतिष शब्द का नामकरण ‘ज्योति’ शब्द को आगे बढ़ाने अर्थात ज्योति को अनेक रूपों में विकसित करने से दिया गया है .
हमने स्वरुप दर्शन के कई लेखों में समझाया है की पूरा ब्रह्माण्ड परमात्मा के प्रकाश से प्रकट हो रहा है . इसलिए इस ब्रह्माण्ड में जितने भी गृह , नक्षत्र , तारे इत्यादि का निर्माण परमात्मा की इसी ज्योति से हो रहा है .
मतलब प्रभु की यही ज्योति हमारे इस शरीर पिंड के रूप में और साथ ही इस ब्रह्माण्ड के रूप में प्रकट हो रही है .
और ब्रह्माण्ड के सभी गृह , नक्षत्र , तारे और हम सभी जीव एक दूसरे से आकर्षण और प्रतिकर्षण बलों से जुड़े हुए है .
मतलब मेरा पेट राहु गृह से भी जुड़ा हुआ है और केतु गृह से भी और पृथ्वी गृह से भी .
पर यह जुड़ाव किस रूप में है और किस प्रकार से ये सम्बन्ध मेरे पेट को हरपल प्रभावित कर रहे है इसका पूरा विज्ञानं स्वरुप दर्शन के ज्योतिष भाग से हम बहुत ही आसानी से समझ सकते है .
अर्थात ज्योतिष एक प्रकार का गणित है . जो हमारे मन और शरीर की स्थिति को ब्रह्माण्ड में हरपल किस जगह है और किस स्थिति में है का गणित के माध्यम से ज्ञान कराता है . अर्थात अभी मै कैसा महसूस कर रहा हूँ या आप कैसा महसूस कर रहे है इसका ज्ञान एक सच्चा ज्योतिषी इस गणित का प्रयोग करके बहुत ही आसानी से हमारे को बता सकता है .
मतलब सूर्य की एक किरण मुझे कैसे प्रभावित कर रही है इसका पता ज्योतिष विज्ञानं से किया जा सकता है .
क्या जन्म के समय हमारा पूरा भविष्य तय हो जाता है ?
इसके उत्तर कई रूपों में है .
जी हाँ . सबकुछ पहले से तय है . और आप की कुंडली में आप का पूरा जीवन काल छिपा रहता है . पर शर्त यह है की आप की कुंडली शत प्रतिशत सही तरीके से बनी हुयी होनी चाहिए . जो एक ज्ञानी ज्योतिषी ही बना सकता है . जिसको ज्योतिष का ज्ञान भगवान् की कृपा से प्राप्त हो , वही व्यक्ति आप की कुंडली सही तरीके से बनाने में सक्षम होता है .
जी नहीं . आप अपनी कुंडली शत प्रतिशत बदल भी सकते है . यह आप के भगवान में विश्वास पर निर्भर करता है . आप अपने मन को बदलकर कुंडली बदल सकते है . जब आप स्वरुप दर्शन का अभ्यास करते है तो भगवान के साथ एकता स्थापित करने लगते है . और इस एकता के कारण ही आप ब्रह्माण्ड से एकता करने में सफल होने लगते है .
और आप को पता है की ब्रह्माण्ड में ही सभी गृह नक्षत्र विध्यमान है . इसलिए अब आप को राहु केतु परेशान नहीं करते है , बल्कि आप के मित्र बनकर आप की सहायता करते है .
स्वरुप दर्शन के अभ्यास में वह क्षमता है जिससे आप शत्रु को भी मित्र में बदल लेते है .
पर यह सब केवल पवित्र भाव से ही संभव हो पाता है . अहंकार से कुंडली बदलना संभव नहीं है .
उदाहरण के लिए किसी जातक(जिस व्यक्ति की कुंडली है उसको ज्योतिष की भाषा में जातक कहते है) को यदि शनि की साढ़े साती परेशान कर रही है . तो ऐसे जातक को प्रत्येक शनिवार को शनि देव के मंदिर में जाकर सच्चे मन से भक्ति और विश्वास के साथ शनि देव भगवान से अपनी सारी परेशानी कहकर भगवान के उत्तर का इन्तजार करना चाहिए .
शनि देव भगवान का उत्तर किसी भी रूप में आ सकता है . इसलिए भगवान के उत्तर को समझने के लिए निरंतर स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते रहना चाहिए .
मेरे मित्रों भगवान् हमे यह समझा रहे है की स्वरुप दर्शन के अभ्यास को हम कई प्रकार से कर सकते है . क्यों की एक ही प्रकार का अभ्यास सभी को लाभ नहीं पंहुचा सकता है . अर्थात भगवान को प्राप्त करने के अनेक रास्ते है . और वे सभी रास्ते स्वरुप दर्शन के अंतर्गत ही आते है .
आप की कुंडली आप के मन में संचित स्मृतियों के आधार पर ही बनती है . अर्थात यह पूरा ब्रह्माण्ड आप के लिए ही कार्य कर रहा है . जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो कुंडली के अनुसार आप के भाग्य में जो दुःख लिखा है , उसका उपाय भी आप के भीतर से आने लगता है .
आगे के लेखों में हम ज्योतिष और आयुर्वेद को ओर गहराई से समझेंगे .
अब बात करते है आयुर्वेद की .
एक ऐसा वेद जो हमारी आयु को बढ़ाता है या सुरक्षित करता है या स्वस्थ करता है आयुर्वेद कहलाता है . सामान्यतया आयुर्वेद वनस्पति जगत से सम्बन्ध रखता है . पर विस्तृत रूप में आयुर्वेद पूजा पद्द्ति, हवन , ध्यान , साधना , ज्योतिष इत्यादि से इस प्रकार से जुड़ा हुआ है जैसे गुलाब से खुशबू.
आयुर्वेद में कई प्रकार की औषधियाँ किसी विशेष प्रकार के मौसम में ही तैयार की जाती है . और कई प्रकार की बीमारियाँ जो ग्रहो नक्षत्रों के प्रभाव के कारण होती है उनके लिए औषधियाँ इन गृह – नक्षत्रों की पूजा अर्चना करके तैयार की जाती है .
भगवान धन्वंतरि से आज्ञा लेकर एक कुशल वैद्य इन औषधियों को तैयार करते है . ज्ञानी वैद्य औषधियों के लिए कई प्रकार के जंगलो का पहले भ्रमण करते है . और फिर भगवान धन्वंतरि के समझाए गए ज्ञान के अनुसार किसी भी बीमारी के इलाज के लिए आवश्यक औषधि के निर्माण के लिए जंगल में उपलब्ध इन जड़ी बूटियों का चुनाव करते है .
अब सबसे जरुरी कार्य यह होता है की जब वैद्य इन जड़ी बूटियों को माँ धरती से और पेड़ से अलग करते है तो पहले पेड़ से क्षमा मांगते है , और कहते है :
हे प्रभु मुझे आप की जरुरत है . इसलिए मै आप को इस अमुक पेड़ से अलग करके मेरे पास अपने प्राणों की रक्षा के लिए आये जीव की बीमारी को दूर करने के लिए एक पवित्र औषधि के रूप में तैयार करना चाहता हूँ .
इसलिए आप मुझे आज्ञा दे .
जब वैद्य को भीतर से पेड़ की अनुमति मिल जाती है तभी वह उस पेड़ का जरुरी भाग लेकर आता है .
और यदि पेड़ आज्ञा नहीं देता है और फिर भी वैद्य पेड़ का वह भाग लेकर आता है तो आप ने देखा होगा कई बार आयुर्वेद की कई औषधियाँ बीमारी को दूर नहीं कर पाती है .
इसीलिए तो आज आयुर्वेद का वास्तविक स्वरुप पहले जैसा नहीं रहा . आज आयुर्वेद के नाम पर जिसको जो समझ आ रहा है वही करता जा रहा है . इसलिए सही परिणाम नहीं आने के कारण कई लोग आयुर्वेद को भी बदनाम कर रहे है .
स्वरुप दर्शन यह कहता है की सभी चिकित्सा पद्द्तियाँ अपनी अपनी जगह सही है . हमें इन का सदुपयोग करना आना चाहिए .
जैसे किसी जातक की कुंडली में किसी बीमारी का योग है तो क्या आयुर्वेद इसकी बीमारी को ठीक कर देगा ?
यह जातक के माध्यम से किया जा रहा स्वरुप दर्शन के अभ्यास की गुणवत्ता पर निर्भर करता है . क्यों की कुंडली में जिस बीमारी का योग होता है , उसी कुंडली में उस बीमारी के इलाज का उपाय भी होता है . अर्थात हर बीमारी के साथ उसका निदान भी छिपा होता है .
स्वरुप दर्शन का अभ्यास इसी निदान को आप के सामने लाकर आप को दे देता है .
इसलिए कुशल वैद्य मरीज को देखकर यह पहचान जाता है की इस पर ग्रहों के प्रभाव से यह अमुक रोग आया है या किसी गलत खान पान की वजह से .
और यदि वैद्य नहीं पहचान पाए तो भी कोई खतरा नहीं है , मरीज खुद भी अपनी कुंडली में दर्शायी गयी बीमारी को वैद्य को बता सकता है .
अर्थात कई बार जानकारी एक दूसरे से साझा करने पर भी मिलती है . क्यों की सभी जवाब आप के भीतर से ही आते है . पर वास्तविक सत्य तो यह है की भीतर और बाहर दोनों एक है .
स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास आप को किसी भी चिकित्सा पद्द्ति हो या कोई अन्य विज्ञानं का सम्मान करना सिखाता है ना की उसकी निंदा करना . अर्थात इस अभ्यास से आप के भीतर एक भोलापन विकसित होता है . और जब आप भोले होने लगते है तभी आप प्रभु की ओर समर्पण के लिए आगे कदम बढ़ाते है .
आयुर्वेद में कई औषधियाँ जातक की कुंडली के आधार पर भी तैयार की जाती है . जैसे कुंडली में यदि जातक के लिए किसी प्रकार का दोष दर्शाया गया है तो फिर उस दोष की शांति के लिए आयुर्वेद में औषधि तैयार की जाती है . इसलिए ज्योतिष और आयुर्वेद परस्पर सम्बन्ध रखते है . सच्चा ज्योतिषी आयुर्वेद का भी सम्मान करता है .
स्वरुप दर्शन के अभ्यास से आप ज्योतिष और आयुर्वेद को विज्ञान के आधार पर समझने लगते है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

