आज हम सभी भक्त प्रेमियों के लिए हमारे प्रभु ‘स्थायी ख़ुशी’ कैसे मिलती है के बारे में विस्तार से समझा रहे है .
सबसे पहले हम ख़ुशी को समझते है .
ख़ुशी केवल एक ही होती है पर इसके रूप अनेक होते है . जैसे किसी व्यक्ति को चाय पिने में ख़ुशी मिलती है तो अन्य व्यक्ति को इसी चाय को पिने में ख़ुशी नहीं मिलती है बल्कि उसे चाय की जगह दूध पिने में ख़ुशी मिलती है .
ऐसा क्यों होता है ?
ऐसा प्रभु की माया के प्रभाव के कारण होता है . अर्थात प्रभु की माया एक बीज से वृक्ष में रूपांतरण की क्रिया है .
मतलब यह हुआ की जिस व्यक्ति को चाय पिने में ख़ुशी मिली थी अभी यदि उसी व्यक्ति को जिस सामग्री से वह चाय बनाई गयी है यदि एक एक करके यह व्यक्ति इस सामग्री को खाता है या पीता है तो
क्या अब भी इस व्यक्ति को वही ख़ुशी मिलेगी जो इस सामग्री से उसने चाय बनाकर पी थी ?
मिल भी सकती है और नहीं भी .
क्यों ?
क्यों की चाय बनाने की क्रिया के दौरान इस व्यक्ति के भावों में कई प्रकार के परिवर्तन हुए है . इस व्यक्ति ने ऐसे भाव व्यक्त किये है जिनके कारण इस व्यक्ति ने खुद ने ही चाय में स्वाद के भाव प्रकट कर लिए .
क्या व्यक्ति खुद ऐसा कर सकता है ?
जी हां .
क्यों की वास्तविक सत्य तो यह है की इस व्यक्ति के मन के पीछे खुद परमात्मा की शक्ति कार्य कर रही है . यह व्यक्ति खुद कुछ भी नहीं कर रहा है . और कर भी नहीं सकता है .
आप खुद कभी यह सोचकर देखना की आप को यह अमुक परिवार ही क्यों मिला है ?
आप किसी अन्य परिवार में भी जन्म ले सकते थे . पर ऐसा नहीं हुआ .
क्यों ?
क्यों की आप का पूरा जीवन चक्र प्रभु की योजना के तहत चल रहा है .
इसलिए जिसे आप चाय पीकर ख़ुशी समझ रहे थे वह प्रभु की माया का प्रभाव है . और इसी प्रभाव के कारण आप के मन का और शरीर का अस्तित्व बना हुआ है .
और अब बात करते है की उस दूसरे व्यक्ति को इसी चाय में ख़ुशी क्यों नहीं मिली उसे दूध में ख़ुशी क्यों मिली ?
क्यों की ऐसा इन दोनों व्येक्तियों के भावों में अंतर् है के कारण हो रहा है . और यह अंतर् हमारे प्रभु ने इन दोनों व्येक्तियों के मनो की रचना ही इस प्रकार से की है की पहले को चाय में ख़ुशी मिलती है और दूसरे को दूध में ख़ुशी मिलती है .
अब बात करते है की यह ख़ुशी स्थायी क्यों नहीं रहती है ?
क्यों की सच में यह ख़ुशी थी ही नहीं . यह तो प्रभु की माया थी .
कैसे पता करे की इस चाय में ख़ुशी नहीं थी ?
इसी चाय को आप चार घंटे के बाद पियेंगे तो फिर अब आप को वह ख़ुशी नहीं मिलेगी जो इसके ताजा रूप में पिने से मिलती है .
अर्थात यह चाय भी प्रतिक्षण बदल रही है .
और प्रभु ने हमारे मन की रचना ही ऐसे की है की मन जिसे एक बार देख लेता है और उससे मन को ख़ुशी मिलती है तो यह मन ऐसा समझ लेता है की मुझे यह ख़ुशी हमेशा मिलती रहे .
अर्थात हमारा मन तीन प्रकार की शक्तियों के साथ कार्य करता है :
- निर्माण की शक्ति (ब्रह्मा की शक्ति)
- सुरक्षा की शक्ति (विष्णु की शक्ति)
- परिवर्तन की शक्ति (शिव की शक्ति)
हमे अब प्रभु विस्तार से समझा रहे है .
प्रभु कह रहे है की उपरोक्त तीनो शक्तियाँ को मै ही प्रकट कर रहा हूँ . अर्थात मै खुद ही इन शक्तियों के रूप में प्रकट हो रहा हूँ .
और मै ऐसा क्यों कर रहा हूँ ?
क्यों की मेरा यह संसार एक बीज से वृक्ष बनने की क्रिया है . मतलब संसार एक वृक्ष है . और इस वृक्ष के अंग सूर्य , तारे , धरती , आसमान , जल , वायु और ऐसे अनेक तत्व है .
ठीक इसी प्रकार से हमारा शरीर भी इसी वृक्ष का एक हिस्सा है .
पर मजे की बात यह है की जो कुछ भी इस संसार में मौजूद है वह सब हमारे इस शरीर के भीतर भी मौजूद है . और यही सब एक पत्थर में भी मौजूद है .
पर इन सब की हमे अनुभूति क्यों नहीं होती है ?
प्रभु की माया के कारण हमें दूरी , समय और द्रव्यमान की अनुभूति होती है . अर्थात यह दूरी ही माया है . अर्थात यह माया प्रभु का स्वप्न है पर प्रभु के नियम के तहत है . और प्रभु का यह नियम तीन मंजिला है :
कारण – सूक्ष्म – भौतिक
जैसे इस लेख को कई व्यक्ति पढ़ेंगे . उनमे से कई तो दो चार लाइने ही पढ़कर बंद कर देंगे , कई आधा लेख पढ़ लेंगे , कई पूरा लेख पढ़ेंगे . और कई पूरा लेख पढ़कर फिर इसे आत्मसात करेंगे .
अर्थात इस लेख को समझकर अपने भीतर उतारकर फिर अभ्यास करेंगे . और ऐसा करते करते वे धीरे धीरे प्रभु की अनुभूति करने लगेंगे .
स्थायी ख़ुशी जब हम प्रभु की अनुभूति में रहते है तभी मिलती है . और भोग से जो ख़ुशी मिलती है वह मायावी ख़ुशी होती है . और माया स्थायी नहीं होती है बल्कि हरपल बदल रही है . इसीलिए हमारी ऐसी ख़ुशी भी हरपल बदल रही है .
क्या हम हरपल प्रभु की अनुभूति में रह सकते है ‘स्थायी ख़ुशी’ के लिए ?
इसका निर्णय खुद प्रभु लेते है .
अब यहां हमे प्रभु एक बहुत ही रोचक चीज समझा रहे है . जब हम प्रभु की अनुभूति में रहते है अर्थात जिसे कई व्यक्ति ब्रह्माण्ड से एकता या ब्रह्माण्ड के साथ बहना कहते है तब हमे ऐसा लगता है की सबकुछ अपने आप हो रहा है .
अर्थात हम वर्तमान में जीने लगते है पर परमतत्व की अनुभूति के साथ .
पर इस अनुभूति में ज्यादा समय तक नहीं रहते है . क्यों की यदि हम इसी अनुभूति में ज्यादा समय तक रहेंगे तो फिर समय , दूरी और द्रव्यमान ये तीनो परमतत्व में विलीन होने लगते है .
और जब ऐसा होना शुरू होता है तो फिर से प्रभु की उपरोक्त तीनो शक्तियाँ शक्रिय होने लगती है . अर्थात आप ने देखा होगा की जब कोई व्यक्ति बहुत ही शांत रहता है तो उसे चलने फिरने में भी दिक्कत होने लगती है . वह बोलता भी बहुत कम है .
पर ऐसी स्थिति में यदि वह शारीरिक कर्म नहीं करता है तो उसके मन में अंकित वे सभी स्मृतियाँ धीरे धीरे उन भावों के अनुरूप बदलने लगती है जिन भावों में अब वह लगातार रहता है .
इसलिए यदि ऐसा व्यक्ति जो पहले रोज व्यायाम करता था , अब उसे व्यायाम करने में आलस आने लगेगा . उसे थकान महसूस होने लगेगी . कोई उसे कुछ भी काम बताएगा तो उसे क्रोध आने लगेगा .
क्यों की मन में जो इतने समय से आदतन कार्य करने की स्मृतियाँ अंकित थी , उसका मन इन्ही स्मृतियों के माध्यम से परमतत्व से शक्ति प्राप्त करते हुए आदत के अनुसार शारीरिक और मानसिक कार्यो को पूरा करता था .
इसलिए इन स्मृतियों की अनुपस्थिति के कारण ऐसा व्यक्ति शरीर से कार्य करने में सक्षम नहीं रहता है .
और जब यही व्यक्ति पूरी तरह मायावी अनुभूति में रहता है तो इसे हर दिखने , सुनायी देने वाली वस्तु सच्ची लगती है . और जब ऐसे व्यक्ति की किसी भी वस्तु का नुक्सान होता है तो वह बहुत ज्यादा दुखी होता है .
क्यों ?
क्यों की ऐसी अवस्था में उसके मन में संचित स्मृतियाँ बहुत ही तीव्र गति से बदलती है . और वह इस तेज गति के बदलावों को सहन नहीं कर पाता है.
इसलिए उसे इस स्थिति में भी स्थायी ख़ुशी नहीं मिलती है .
इसलिए प्रभु हमे मध्यम मार्ग अपनाने के लिए कहते है . पर प्रभु यह बात सभी को नहीं कहते है .
जो गृहस्थ में अपना जीवन जी रहा है उसे अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए साकार की पूजा करने के लिए हमारे प्रभु कह रहे है . इसलिए ऐसा व्यक्ति स्थायी ख़ुशी को प्राप्त कर लेता है .
क्यों की ऐसे गृहस्थ व्यक्ति के जैसे एक संतान का जन्म होता है तो वह उसके सम्पूर्ण जीवन को खुशियों से भरने का स्वप्न देखता है . और वह उस स्वप्न में ही खुश रहता है .
यदि ऐसे व्यक्ति को कोई यह कहे की मोहमाया में क्या रखा है तो उसे क्रोध आता है . पर धीरे धीरे उसका लक्ष्य स्पष्ट होने के कारण वह इस क्रोध को भी स्थायी ख़ुशी में बदलने लगता है .
और जो व्यक्ति गृहस्थ में नहीं है और साथ ही मोह माया से ऊपर उठ जाता है उसे स्थायी ख़ुशी परमतत्व निराकार में विलीन होने पर ही मिलती है .
पर यह सब हमारे हाथ में नहीं होता है . यह एक समझाने का तरीका है की हम कौन है और कहाँ से आये है और यहां कब तक रहेंगे .
इसलिए हमे निरंतर वर्तमान में जीने का अभ्यास करना चाहिए . तभी धीरे धीरे स्थायी ख़ुशी की अनुभूति होने लगेगी . स्वरुप दर्शन के अभ्यास के अनेक तरीकों में से आज हमारे प्रभु ने उपरोक्त तरीका बताया है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

