मेरे दोस्त आप इच्छा पूरी करने का विज्ञानं समझने जा रहे है . आप ईश्वर की संतान है . और आप के पास वे सभी शक्तियाँ हर समय मौजूद है जिनको आप पहचानकर अपने जीवन को जैसा भी आप जीना चाहते है आप शत प्रतिशत जी सकते है .
पर यदि आप अभी यह लेख पढ़ रहे है और आप इसे कितना प्रतिशत समझ पा रहे है यह आप की अभी वर्तमान की चेतना स्तर पर निर्भर करता है .
जैसे यदि आप उर्दू भाषा जानते है और मै नहीं जानता हूँ . तब यदि आप मुझे उर्दू भाषा में कुछ समझाना चाहेंगे तो मै नहीं समझ पाऊंगा .
अब आप कल्पना करे की आप को तो उर्दू भाषा बहुत अच्छे से आती है पर मुझे उर्दू भाषा आती है या नहीं इसका आप को अभी पता नहीं है .
और आप आगे यह कल्पना करे की मुझे भी उर्दू भाषा आती है . पर मेरे लिए सच यह है की मुझे उर्दू भाषा नहीं आती है .
अब जब भी आप मुझे कुछ समझाने का प्रयास करेंगे तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आयेगा.
और आप भीतर से उस समय यह सोच रहे है की मुझे आप की भाषा समझ में आ रही है . फिर आप आगे यह सोचेंगे की जब मुझे आप की भाषा समझ में आ रही है तो फिर मै आप से ठीक से बात क्यों नहीं कर रहा हूँ .
इसलिए अब आप को मेरे ऊपर क्रोध आने लगेगा .
और इस पूरे संसार में हम सभी के साथ ऐसा ही हो रहा है .
अर्थात जैसा संसार मुझे दिखाई दे रहा है वैसा संसार आप को दिखाई दे भी सकता है और नहीं भी .
यह इस बात पर निर्भर करता है की मेरा और आप का मन दोनों एक दूसरे की भाषा कितना प्रतिशत समझते है .
इसीलिए परिवारों में , समाज में और इस देश दुनिया में रात दिन झगड़े हो रहे है .
और ऐसा होना भी प्राकृतिक ही है . क्यों की हम सभी के मनो का इस प्रकार से व्यवहार करना ही परमात्मा की माया का मुख्य आधार है .
मतलब मेरे और आप के सम्पूर्ण क्रियाकलापों में एक ही परमात्मिक शक्ति कार्य कर रही है .
पर इस शक्ति में अनंत प्रकार का ज्ञान छिपा हुआ है . इसीलिए मेरा चेहरा आप से भिन्न दिखाई देता है .
और मजे की बात यह है की जैसा मेरा चेहरा आप को दिखाई दे रहा है , तो यह जरुरी नहीं है की आप के भाई को भी मेरा चेहरा वैसा ही दिखाई देगा .
मेरा चेहरा आप के भाई को कैसा दिखाई देगा यह आप के भाई और मेरे मनो की आप सी समझ पर निर्भर करता है .
अर्थात मेरे और आप के भाई के मनो के बीच कैसा सम्बन्ध है .
इच्छा पूरी करने का विज्ञानं – आप की किसी भी इच्छा को पूरी करने में हम सभी के मन मदद करते है
जैसे आप को इच्छा हुयी की आप रिक्शे में बैठकर घूमना चाहते है .
पर यदि आप किसी रिक्शा वाले के पास जाते है और उसे कहते है की भाई मुझे इस अमुक स्थान पर लेकर चलो .
अब यदि आप से रिक्शा वाला यह कह दे की नहीं भाई मै आप को नहीं लेकर चल सकता .
तो आप रिक्शे वाले से पूछेंगे की क्यों भाई , नहीं ले जा सकता ?.
अब आप से रिक्शे वाला कहता है की भाई आप को एक बार मना कर दिया है न . फिर बार बार क्यों पूछ रहे हो ?.
और इस प्रकार से आप उस रिक्शे वाले का व्यवहार देखकर आश्चर्यचकित हो जाते है . और थोड़ा साइड में खड़े हो जाते है .
अब आप यह देखते है की एक सज्जन आते है और उसी रिक्शे वाले से कहते है की भाई मुझे किरण पैलेस जाना है . और रिक्शे वाला तुरंत उसे बिठाकर चल देता है .
आप यह सब देखकर और ज्यादा आश्चर्यचकित रह जाते है .
अब आप यह सोचते है की मेरे को वो रिक्शे वाला क्यों नहीं लेकर गया और इस सज्जन को कैसे बिठाकर ले गया ?.
आप के इस प्रश्न का वास्तविक जवाब स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से मिलता है .
जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास पूरी श्रद्धा और सच्ची भक्ति के साथ करते है तो आप को अपनी इच्छा का स्वरुप सच में समझ में आता है .
क्यों की अब आप मन को समझने लगते है . आप को यह ज्ञान होने लगता है की यह प्रकृति कैसे कार्य करती है ?.
आप चेतन मन और अवचेतन मन से ठीक से परिचित होने लगते है . फिर धीरे धीरे आप हम सभी के जुड़े हुए मनो से (Collective Consciousness ) परिचित होने लगते है .
स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास आप को सर्वव्यापकता की अनुभूति कराता है . पर साथ ही आप को आप की सीमाओं का भी ज्ञान कराता है .
मतलब यदि आप सामने वाले के मन को नियंत्रित करने की शक्ति प्राप्त कर लेते है तो आप इसका दुरूपयोग नहीं कर सकते है .
इच्छा पूरी करने का विज्ञानं – गहराई से समझे
आप केवल परमात्मा की इच्छा से ही सामने वाले को दिशा निर्देश दे सकते है .
और ऐसा इसलिए होता है की आप दोनों के मनो के पीछे हम सभी के परमपिता की एक ही शक्ति कार्य कर रही है . और यह शक्ति हम सभी की रक्षा करती है .
जब भी हम में से कोई भी व्यक्ति इस शक्ति के नियमों का उल्लंघन करता है तो फिर यही शक्ति उस अमुक व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही करती है .
और आज इसी का परिणाम हम सभी के सामने भूकंप , सुनामी , महामारी , जातिवाद , आंधी तूफ़ान जैसी भयंकर आपदाओं के रूप में दिखाई दे रहा है .
और हम सभी इन आपदाओं से किसी न किसी रूप में अवश्य प्रभावित हो रहे है .
तभी तो आप के मन में ऐसी ऐसी इच्छाएँ उठती है जो आगे चलकर आप ही को बहुत बड़े कष्टों में डाल देती है .
मै यहाँ इच्छा के उठने के विरोध में नहीं हूँ . इच्छा उठने के बाद आप उस इच्छा के साथ क्या करते है मै आप को वह समझाने का प्रयास कर रहा हूँ .
जब आप स्वरुप दर्शन क्रिया का अभ्यास करते है तो फिर आप ऐसी किसी भी इच्छा को कैसे पूरी करना है या करना भी है की नहीं इत्यादि के लिए उचित निर्णय लेने में सफल होने लगते हो .
जैसे आप को इच्छा हुयी की घर में आप का छोटा बच्चा बहुत शैतानी कर रहा है और आप उसे थप्पड़ मारकर समझाना चाहते है .
अब यदि आप को बच्चे के मन की समझ नहीं है तो आप उसे थप्पड़ मारकर समझाने की कोशिश करते है और आप का काम ज्यादा बिगड़ जाता है .
हो सकता है की आप के थप्पड़ मारने से घर के अन्य सदस्य आप से नाराज हो जाए . और आप से यह कहने लगे की यदि आप को कोई थप्पड़ मारके समझाए तो आप को कैसा लगेगा ?.
लाजमी है की आप को बहुत बुरा लगता है .
मतलब मै आप से यह कहना चाहता हूँ की आप को महाभारत का युद्ध बच्चे के साथ नहीं करना है बल्कि खुद के साथ करना है .
अर्थात आप को खुद की उन सभी इच्छाओं के साथ युद्ध लड़ना है और युद्ध जीतना भी है जो आप को हरपल खुश रहने से रोकती है .
और हरपल खुश रहने की इच्छा स्वरुप दर्शन क्रिया के अभ्यास से प्रकट होती है . मतलब आप अपने आप को पहचानकर ही हरपल खुश रहने लगते है .
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धन्यवाद जी . मंगल हो जी .
