जो हम महसूस करते है ये ब्रह्मांड हमे वही देता है . अर्थात आप के साथ वह नहीं हो रहा है जो आप चाहते है , आप भगवान से मांगते है या आप रात दिन सोचते है . बल्कि आप के साथ वह हो रहा है जो आप हरपल महसूस कर रहे है .
और आप अपनी भावनाओं के अनुरूप ही महसूस कर रहे है . अर्थात पूरा खेल आप के भावों का है . और आप के ये भाव अब तक के दिमाग में संचित स्मृतियों के अनुसार ही आप को महसूस कराते है .इसलिए आज के इस लेख में ‘अच्छा महसूस कैसे करे?’ को विज्ञानं के आधार पर समझाया जा रहा है.
आप ने सुना भी होगा की भगवान केवल भाव के भूखे है . इसका क्या मतलब है ?
इसका मतलब यह है की जिन भावों से हमारे भगवान प्रसन्न होते है हमे केवल उन्ही भावों को विकसित करना चाहिए .
और हम अच्छा महसूस भी तभी करते है जब हमारे भाव निर्मल होते है . यहाँ निर्मल भावों का क्या अर्थ है ?
यहां निर्मल शब्द हमारे मन के लिए प्रयुक्त हुआ है .
निर्मल मन का अर्थ है की ऐसा मन :
- जो सुख दुःख में स्थिर रहता है
- किसी भी दृश्य से राग द्वेष नहीं करता है
- सभी जीवों के प्रति समान भाव रखता है
- हर प्रकार के भोजन के साथ प्रसन्न रहता है
- हर प्रकार की गंध दुर्गन्ध से विचलित नहीं होता है
- कर्म हमेशा सेवा भाव से करता है
पर यह जरुरी नहीं है की जिस व्यक्ति का मन निर्मल हो और आप उसे देखकर पता कर ले .
अर्थात जैसे हम यह कहते है की किसी व्यक्ति को देखकर हम यह कह सकते है की वह अभी अच्छा महसूस कर रहा है या नहीं . यह बात सभी के लिए लागु नहीं होती है .
अच्छा महसूस कैसे करे ?
निरंतर स्वरुप दर्शन का अभ्यास करके आप हमेशा के लिए अच्छा महसूस करने लगते है .
आइये स्वरुप दर्शन के अभ्यास को थोड़ा विस्तार से समझते है :
स्वरुप दर्शन का वास्तविक अर्थ है खुद के दर्शन करना . अपने आप को पहचानना . अपने शरीर को वास्तविक रूप में समझना .
स्वरुप दर्शन को आप निम्न प्रकार से भी समझ सकते है :
सबसे पहले आप इस संसार जगत में खुद के होने का अहसास करे . इसका सबसे सरल तरीका सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्र होने की क्रिया है .
अर्थात सबसे पहले यह विश्वास करे की कण कण में केवल परमात्मा का ही अस्तित्व है . इसलिए आप के इस शरीर के रूप में खुद परमात्मा ही आत्मा के रूप में प्रकट हो रहे है .
इसका मतलब स्वरुप दर्शन के अभ्यास से हम परमात्मा को कण कण में मानकर अपनी आत्मा को सिर से लेकर पाँव तक में एकाग्र होने की क्रिया के माध्यम से चिन्हित करते है .
अर्थात ऐसा करके हमे जो कण कण में परमात्मा का अहसास होना चाहिए वह अभी शुरुआत में हमारे इस शरीर में ही महसूस होता है .
अर्थात हम हमारे इस शरीर में एकाग्र होने पर जितने भी परिवर्तन हम मन के माध्यम से महसूस करते है , वे सभी परिवर्तन हमारी आत्मा के अहसास ही होते है . कैसे ?
क्यों की हमारा मन बिना आत्मा से शक्ति प्राप्त करे कुछ भी महसूस नहीं कर सकता है . अर्थात हमारा मन हमारी आत्मा की शक्ति से ही प्रकट होता है और फिर इसी की शक्ति से इस शरीर और संसार की रचना करता है .
और इस मन का नियंत्रण हमारी बुद्धि के पास होता है .
इसलिए हमे आत्मा को चिन्हित करने के बाद हमारी बुद्धि को चिन्हित करना होता है . अर्थात आत्मा को चिन्हित करने के बाद हम जाग्रत होने लगते है . मतलब हमारी बुद्धि जागने लगती है . और इस जाग्रत बुद्धि से अब हम हमारे मन को हैं जैसा चाहे वैसा रच सकते है .
इसलिए जब स्वरुप दर्शन के अभ्यास से हमारी बुद्धि जाग्रत होने लगती है तो इसी बुद्धि के माध्यम से हम यह मह्सूस करने में कामयाब होने लगते है की हमारे मन के भीतर किस प्रकार की स्मृतियाँ लगातार संचित हो रही है . और पहले की स्मृतियाँ किस प्रकार की है .
जैसे आप अभी स्वरुप दर्शन का अभ्यास कर रहे है और इस अभ्यास के दौरान यदि आप को कोई व्यक्ति परेशान करता है तो अब आप पहले की तरह प्रतिक्रिया नहीं करेंगे .
क्यों की पहले जब आप इस व्यक्ति के संपर्क में आते थे तो आप अच्छा महसूस नहीं करते थे . और ऐसा आप ही के माध्यम से किसी समय किये गए कर्मो के परिणाम के कारण होता है .
पर इस बार जब आप अभ्यास कर रहे है तो अब आप का मन आप को बुरा महसूस कराना शुरू कर रहा है . लेकिन अब आप की बुद्धि जाग्रत हो रही है इसलिए इस बुद्धि से आप को यह ज्ञान प्राप्त होने लगता है की इस अमुक व्यक्ति का अब सामना इस प्रकार से करना है की अब आप को परेशानी के भावों की जगह अच्छा महसूस करने के भाव विकसित करना आने लगता है .
मतलब इसी को होशपूर्वक जीवन जीने का अभ्यास कहते है . और जब हम होशपूर्वक बोलते है , चलते है , खाते पीते है, स्पर्श करते है , सुनते है तो सभी इन्द्रियाँ अपने अपने विषयों का सेवन करते हुए भी उनमे आसक्त नहीं रहती है . और जब इन्द्रियाँ भी होशपूर्वक जीवन जीने के कारण जाग्रत होने लगती है तो फिर इनके विषय इनको पकड़ नहीं पाते है .
मतलब यदि आप किसी भोजन को या किसी काम को बहुत ही आनंद के साथ कर रहे है और अचानक यदि आप के किसी पुराने संचित कर्म के कारण आप का कोई शत्रु या मित्र आप को इस भोजन से अलग कर देता है या फिर आप को यह अमुक काम करने से रोक देता है तब भी आप उतने ही आनंद को महसूस करते रहेंगे .
कोई मुझे भोजन करते हुए रोकेगा फिर भी मै अच्छा महसूस कैसे कर सकता हूँ ?
क्यों की जब आप स्वरुप दर्शन का सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ अभ्यास करते है तो फिर आप का मन भगवान् से जुड़ने लगता है और आप को यह अनुभूति होने लगती है की आप के इस मन और शरीर के माध्यम से खुद भगवान ही यह भोजन करने की क्रिया कर रहे है .
और फिर आप को यह भी अनुभव होने लगता है की जो अमुक व्यक्ति आप को भोजन करने से रोक रहा है वह भी आप के ही भगवान् का दूसरा रूप है .
इसलिए आप को निरंतर भगवान से प्राण शक्ति मिलने के कारण अच्छा महसूस होता रहता है .
पर यह सभी अहसास दस बीस दिन में संभव नहीं होते है . यह आप के संचित कर्मो और आप का भगवान में कितना विश्वास है इस पर निर्भर करता है .
इसलिए अच्छा महसूस करने में कितना समय लगेगा यह हर व्यक्ति के लिए अलग होता है . पर यह शत प्रतिशत सच है की यदि आप चाहे तो हर समय अच्छा महसूस कर सकते है . क्यों की मन की कार्य प्रणाली को आप मन के ऊपर ध्यान लगाकर ही समझ सकते है .
इस प्रकार आज हमने ‘अच्छा महसूस कैसे करे?’ लेख के माध्यम से स्वरुप दर्शन के अभ्यास को समझने का प्रयास किया है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

