आज मेरे प्यारे मित्रों हमारे प्रभु ‘मन और भगवान’ के बीच सम्बन्ध को विस्तार से समझा रहे है .
भगवान क्या है ?
भगवान कण कण में व्याप्त एक ऐसी सत्ता है जो खुद इस ब्रह्माण्ड के रूप में प्रकट हो रही है . और इस सत्ता के खुद प्रभु ने कई नाम निकाल रखे है . जैसे :
- परमात्मा
- भगवान
- ईश्वर
- अल्लाह
- खुदा
- निराकार शक्ति
- विश्व शक्ति
- प्राण शक्ति
- तत्व
- ऊर्जा
- ज्ञान
- आनंद
- ख़ुशी
ऐसे अनेक नामों से हम संसारी लोग भगवान को मानते आ रहे है . और ऐसे ही मानते रहेंगे .
क्यों की यह सब अपने आप होने वाली घटना है .
भगवान ने अपने आनंद को अलग अलग रूप देने के लिए ही इस मन की रचना की है . अर्थात मन इस अदृश्य शक्ति से प्रकट हुआ दृश्य और अदृश्य का मिला झूला रूप है .
या आसान शब्दों में मन भगवान की छाया है . जैसे किसी इंसान की छाया होती है .
हम किसी इंसान की छाया को पकड़ते पकड़ते उस इंसान तक पहुंच सकते है जिसकी यह छाया है .
ठीक इसी प्रकार से इस संसार की हर एक वस्तु भगवान की छाया है .
इसलिए यदि हम भगवान की अनुभूति करना चाहते है या भगवान को पकड़ना चाहते है तो हमे भगवान की उस छाया को पकड़ना चाहिए जो हमारे सबसे करीब है .
और वह छाया हमारा खुद का शरीर है . अर्थात हमारे भगवान खुद इस छाया के साथ हमारे आसपास ही हरपल घूम रहे है .
आप ने कई बार बोलचाल में सुना भी होगा की जब हम किसी से मिलते है तो यह कहते है की ‘और भगवान आप के क्या हाल चाल है ?’.
इसे प्रभु अब और विस्तार से निचे समझा रहे है :
हमारे प्रभु कह रहे है की जो कुछ भी तुम इस मुँह से बोल रहे हो वह मै खुद ही आप के इस शरीर और मन के माध्यम से बोल रहा हूँ .
मतलब भगवान यह कह रहे है की आप की आँखे जो देख रही है , कान जो सुन रहे है , आप जो श्वास ले रहे है , आप के पेट में जो भोजन पच रहा है उन सभी क्रियाओं के रूप में मै खुद ही अपने आप को व्यक्त कर रहा हूँ .
मै ही मन के रूप में इस संसार का राजा हूँ . और आप की सभी इन्द्रियों को मन के माध्यम से मै खुद ही संचालित करता हूँ .
मेरी बिना आज्ञा के मन की हिम्मत नहीं है की वह एक सूत भी इधर उधर भाग जाये .
फिर हमारा मन इतना चंचल क्यों होता है ?
पहली बात तो सभी व्येक्तियों का मन इतना ज्यादा चंचल नहीं होता है . दूसरी बात जिस किसी इंसान का भी मन यदि बहुत ज्यादा चंचल है तो उसके पीछे भी मुख्य कारण मै ही हूँ ?
कैसे ?
उस इंसान के रूप में मेने ऐसे कर्म किये है की मेने उसके मन की रचना ही इस प्रकार की करदी है . अर्थात ऐसा इंसान खुद कुछ नहीं कर रहा है , बल्कि उसके मन और शरीर के माध्यम से मेने कई जन्मों से ऐसे कर्म किये है की मेरे माध्यम से रचा गया इस इंसान का मन अब बहुत चंचल हो गया है .
पर मै मन से माया का ऐसा खेल खेलता हूँ की सबकुछ मै ही कर जाता हूँ पर फिर भी खुद पर कुछ नहीं लेता हूँ . अर्थात एक ही वस्तु को मै दो इंसानो को अलग अलग दिखाकर उन्हें लड़ाकर मेरा मनोरंजन कर लेता हूँ .
इसे मै एक उदाहरण से आप को समझाता हूँ :
जैसे किसी इंसान ने किसी जन्म में ऐसी सोच के साथ अपना जीवन जीया है जिसमे उसने हमेशा खुद को दुसरो से बड़ा इंसान समझा है , लोगों के ऊपर राज किया है तो ऐसा इंसान इस वर्तमान जीवन में भी वैसे मन के साथ ही लोगों के साथ व्यवहार करता है .
और जब मै चाहूंगा तभी ऐसा इंसान उसके इस प्रकार के अहंकारी स्वभाव से बाहर निकल पायेगा .
इसीलिए तो आप ने भी कई बार सुना होगा की कोई इंसान गलती करने के बाद फिर यह कहता हुआ मिलता है की आखिर मेरे से यह गलती कैसे हो गयी . मै तो इतनी सतर्कता बरत रहा था फिर भी मेरा मन वहाँ कैसे चला गया .
इसका जवाब भगवान यह देते है की उस इंसान का मन उसके कर्मो का ही परिणाम होता है . अर्थात मन में उसकी ऐसी पुरानी आदते बहुत ही गहराई में जमा रहती है . और वह इन आदतों की गुलामी से तभी मुक्ति प्राप्त करता है जब ऐसा इंसान स्वरुप दर्शन का अभ्यास करता है .
और यह अभ्यास प्रभु कृपा से ही संभव होता है . इसीलिए हमे निरंतर भगवान् का ही चिंतन करना चाहिए , पता नहीं हम कब भगवान की कृपा के पात्र बन जाए .
इसलिए यदि आप यह सोच रहे हो की आप मन को वश में करके मुझे प्राप्त कर लोगे तो आप यह समझले की यह विचार भी मै ही आप के मन में डालता हूँ और यह मेरा एक मायावी विचार ही है .
जब तक मै खुद नहीं चाहूंगा आप चाहे कितना भी प्रयास करले आप केवल मन को वश में करके मुझसे नहीं मिल सकते .
ऐसा भगवान क्यों कह रहे है ?
भगवान ऐसा इसलिए कह रहे है , क्यों की वे अपनी संतान को बहुत प्रेम करते है और अपनी संतान से कभी भी झूठ नहीं बोलते है .
इसलिए वे हमे यह समझा रहे है की मन तो मेरी छाया है और मेरे बिना इस छाया का अलग से कोई अस्तित्व नहीं है .
इसलिए यदि हम यह कहते है की हम मन को वश में कर सकते है तो इसका मतलब होता है की हम भगवान को वश में कर सकते है .
और भगवान को केवल प्रेम से ही वश में किया जा सकता है . इसीलिए तो भगवान यह कह रहे है की मेरे बच्चे तुम हर परिस्थिति में खुश रहने का पहले अभ्यास तो शुरू करो .
जैसे जैसे तुम हर परिस्थिति में खुश रहने का अभ्यास करोगे तो मै खुद आप के पास आने लगूंगा .
अर्थात पहले आप अपने इस मन को अपने शरीर के ऊपर लेकर आने का अभ्यास तो शुरू करो .
मतलब मुझे वश में करने से पहले आप अपने इस शरीर को तो वश में करने का अभ्यास शुरू करो .
यहाँ भगवान उपरोक्त कथन को निचे और विस्तार से समझा रहे है :
हमारे भगवान कह रहे है की तुम पहले तुम्हारे शरीर को तो वश में करो मतलब जीभ से वे शब्द ही बोलों जो मुझे प्रिय है .
क्या कोई व्यक्ति अपनी जीभ से किसी को गाली देता है तो क्या वह अपनी जीभ से प्रेम करता है ?
नहीं .
जब ऐसा व्यक्ति अपनी जीभ से ही प्रेम नहीं करता है तो भगवान ऐसे व्यक्ति को यह समझा रहे है की मै कैसे आप के पास आ जाऊ जब आप जिस इंसान को गाली दे रहे है उस इंसान के रूप में भी मै ही तो प्रकट हो रहा हूँ .
आप मंदिर , मस्जिद जाकर मुझे बहुत पुकारते हो और वह भी बहुत प्रेम से और बाहर आकर आप को जो तंग करता है उसको फिर जीभ से गाली निकालते हो . पर आप यह भूल जाते हो की गाली सुनने वाला इंसान भी मै ही हूँ .
अब आप ही बताइये की मै आप के पास कैसे आऊ.
अब आप यही तो कहेंगे की कोई व्यक्ति आप को बहुत ज्यादा परेशान करेगा तो गाली नहीं निकालेंगे तो क्या उसकी आरती उतारेंगे?
जी हाँ . यदि आप वास्तविक रूप में मुझे प्राप्त करना चाहते हो तो जो व्यक्ति आप को बहुत ज्यादा परेशान करता है , आप उसके लिए मन ही मन कल्याण के भाव व्यक्त करे . और अपने मन में यह कहे की हे मेरे प्रभु इस अमुक व्यक्ति को सद्बुद्धि प्रदान करो ताकि यह मुझे परेशान करना बंद करे .
फिर देखो मै कैसे ऐसे व्यक्ति की बुद्धि को कुमार्ग से सुमार्ग की तरफ घुमाता हूँ .
अब भगवान हमे आगे यह समझा रहे है की हम किसी का बुरा नहीं चाहते है फिर भी हमारे साथ बुरा क्यों होता है ?
क्यों की अभी हम गहरी नींद में सोये हुए है .
और स्वरुप दर्शन का अभ्यास हमे इस गहरी नींद से जगाता है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

