आज हमारे प्रभु मन का वह राज समझा रहे है जिसे कोई इंसान समझ ले तो फिर ऐसा इंसान मन से मित्रता करके मुझे प्राप्त कर लेगा .
मन से मित्रता स्थापित करने का मार्ग निम्न प्रकार से होकर जाता है :
क्या आप को कोई इंसान दुःख पहुँचाये तो आप को अच्छा लगेगा ?
नहीं .
क्या आप अपने जीवन में जिन खुशियों के हकदार है तो क्या सामने वाला इंसान नहीं है ?
अवश्य आप जितना ही वह भी अपनी खुशियों का हकदार है .
फिर हमे हमारी गलतियाँ क्यों नहीं नज़र आती है ?
क्यों की अभी हम पूरी तरह जाग्रत नहीं हुए है . और हम अभी मन की चाल में ही फसे हुए है .
कोई कहता है की यह पूरा संसार आप का ही प्रतिबिम्ब है तो कोई कहता है की आप ही द्रष्टा और आप ही दृश्य और आप ही पर्यवेक्षक है .
जी हां . उपरोक्त सभी बाते सही है पर आंशिक रूप से .
पूर्ण सत्य तो यह है की केवल परमात्मा का अस्तित्व ही है . खुद परमात्मा की शक्ति ही इन सभी बातों के रूप में प्रकट हो रही है .
इसलिए यह मन भी परमात्मा का ही साकार रूप है . और इस मन में वे दोनों ज्ञान छिपे हुए है जिसमे पहला ज्ञान तो यह है की यदि आप यह विश्वास करले की आप के शरीर की सभी इन्द्रियाँ केवल और केवल भगवान् के लिए कर्म करने के लिए बनी है .
तो फिर यदि आप इन सभी इन्द्रियों में विश्वास करके भगवान की उपस्थिति को स्वीकार कर लेते है तो फिर आप के भीतर से यह ज्ञान प्रकट होगा की अब आप को आँखों का सही प्रयोग कैसे करना है ?
अर्थात आप को मन से मित्रता करने के लिए मन के हर एक भाग से मित्रता करना अनिवार्य शर्त है .
इस प्रकार से आप समझ रहे है की आँखों का निर्माण भी तो हमारे इस मन ने ही किया है . अर्थात हमारे इस पूरे शरीर का रचियता हमारा मन ही है . और हमारे इस मन का रचियता खुद परमात्मा है .
अब आँखों से मित्रता को वास्तविक रूप में समझते है :
स्वरुप दर्शन के अभ्यास से जब हम पहले आत्मा से जुड़ने का प्रयास करते है तो फिर हमें धीरे धीरे आत्मा से शक्ति मिलने लगती है .
और यदि हमारे कर्मो के कारण हमारी आत्मा अभी ज्यादा जाग्रत नहीं है तो फिर यही आत्मा खुद को जाग्रत करने के लिए परमात्मा से शक्ति प्राप्त करने लगती है . जैसे कई बार हम बहुत बड़ी मुसीबत में फस जाते है तो अपने इष्ट देव को याद इस प्रकार से करते है :
हे भगवान मुझे इतनी शक्ति दो ताकि मै इस मुसीबत से निकल सकू .
इसका मतलब यही होता है की मुसीबत में हमारी आत्मा इस मन रुपी पिंजरे से बाहर निकलने के लिए अपने पिता को याद करती है .
तो यदि हमारी प्रार्थना परमात्मा में पूर्ण विश्वास से भरी हुयी है तो हमारे परमपिता तुरंत किसी न किसी रूप में आकर हमारी मदद कर देते है .
हमारे प्रभु हमे किसी भी और कितनी भी बड़ी मुसीबत आ जाए उससे भागने के लिए कभी नहीं कहते है .
अर्थात जिन आँखों से हम मुसीबत वाला दृश्य देख रहे है उस दृश्य से हमे घृणा की बजाय सच्चा प्रेम करना है . अर्थात मुसीबत को ही प्रभु का रूप स्वीकार करना है .
यदि हम मुसीबत के समय ऐसा करने में कामयाब हो जाते है तो इसका मतलब हम स्वरुप दर्शन का अभ्यास ठीक से कर रहे है . और हमे यह मुसीबत के समय शक्ति केवल एक दिन के अभ्यास से नहीं मिल सकती है .
इसके लिए निरंतर स्वरुप दर्शन का अभ्यास अनिवार्य है .
क्यों की जब हमारा मन मुसीबत के समय भी आँखों से मुसीबत वाला दृश्य देखने पर भी विचलित नहीं होता है तो इसका मतलब हमारी आँखे अब प्रभु का प्रेम पाने के कारण इस मुसीबत वाले दृश्य से भी उतना ही प्रेम कर रही है जितना हमारी आँखे किसी सुनहरे दृश्य को देखकर खुश होती है .
प्रभु यहां यह नहीं कह रहे है की आप को मुसीबत को गले लगाना है . बल्कि प्रभु यह कह रहे है की खुद को हर प्रकार की परिस्थिति के साथ स्वीकार करने का अभ्यास करना है . इसे ही स्वरुप दर्शन का अभ्यास का एक तरीका कहते है .
क्यों की जब तक आप अपने मन को चाहे वह कैसा भी हो स्वीकार नहीं करेंगे तो फिर सामने वाले के मन को भी आसानी से स्वीकार नहीं कर सकते . और जब मन को ही बिना राग द्वेष के स्वीकार नहीं करेंगे तो फिर आप मन से मित्रता कैसे कर पायेंगे.
इसे प्रभु निम्न उदाहरण से भी समझा रहे है :
जैसे हमारे शरीर में बहुत तेज दर्द हो रहा है . तो अब यदि हम इस दर्द को स्वीकार नहीं करते है तो यह प्रतिक्रिया के कारण आप को भी स्वीकार नहीं करेगा . और इस प्रकार से दर्द अब दुगुनी तीव्रता से बढ़ जायेगा .
पर यदि आप इस दर्द को स्वीकार कर लेते है तो इसका मतलब यह है की प्रभु इस दर्द के रूप में ही प्रकट हो रहे है . इसलिए आप के दर्द को स्वीकार करने के कारण इसी दर्द में से वह ज्ञान प्रकट होगा जिससे आप इस दर्द से मुक्त होने लगेंगे .
जैसे या तो आप के मन में यह विचार आयेगा की आप को किस प्रकार की चिकित्सा कराने की आवश्यकता है या फिर अन्य किसी इलाज के बारे में प्रभु किसी न किसी माध्यम से आप से संपर्क कर लेंगे .
क्यों की वास्तविक सत्य यह है की हमारा मन प्रभु की छाया है . और मन से ही शरीर का निर्माण हुआ है इसलिए हमारा शरीर भी प्रभु की छाया है . इसीलिए अब आप खुद ही समझे की इस शरीर रुपी छाया को नज़रअंदाज करके हम सीधे प्रभु को कैसे प्राप्त करेंगे .
इसलिए हमारी यह देह प्रभु से मिलन का साधन है . अब यदि साधन से ही हमारी मित्रता नहीं है तो आप यह कैसे विश्वास कर सकते है की आप का यह साधन आप को प्रभु तक की यात्रा सफलता पूर्वक करा देगा .
और जो इंसान यह कहते है की मन बहुत ही नीच है इस पर कभी विश्वास मत करना . स्वरुप दर्शन के इन लेखों में मेने भी कई बार यह बात लिखी है .
आज प्रभु इसे स्पष्ट कर रहे है :
मन एक धोखा है , ऐसा विचार भी प्रभु ही हमारे मन में डालते है . क्यों की हर इंसान को समझाने के अलग अलग तरीके होते है .
जैसे कोई इंसान मन की चाल में इस कदर फस गया है की अब वह सत्य और अहिंसा का मार्ग पूरी तरह भूल गया है . अर्थात कोई ऐसा इंसान जो भोग विलास में इस कदर डूबा हुआ है की उसके बुद्धि और विवेक अब ठीक से कार्य नहीं कर रहे है . इसलिए ऐसे इंसान को समझाने के लिए उसे यह कहना बहुत जरुरी है की भाई आप इस मन के धोखे में आकर प्रभु को क्यों भूल रहे हो .
अर्थात जब किसी फोड़े में बहुत ज्यादा कीड़े पड़ जाए तो फोड़े को ऑपरेशन से अलग करना बहुत जरुरी होता है . यही सच्चा ज्ञान होता है .
पर यहां सबसे ज्यादा समझ इस बात की रखनी है की पहले हमें हमारी आत्मा में विश्वास करने का अभ्यास स्वरुप दर्शन के माध्यम से करना बहुत जरुरी है .
क्यों की सीधा परमात्मा में विश्वास करना सभी लोगों के लिए इतना आसान नहीं होता है .
मतलब प्रभु यह कह रहे है की जब आप खुद के मन से अभी मित्रता की जगह शत्रुता के भाव रखते हो (क्रोध करके – क्यों की क्रोध में पहले व्यक्ति खुद को जलाता है फिर सामने वाले को ) तो आप के लिए यह आसान नहीं होगा की आप खुद भूखे रहे और सामने वाले को अपना भोजन देदे .
अर्थात खुद की आत्मा की अवहेलना करके आप सामने वाले की आत्मा से प्रेम नहीं कर सकते है . और यदि आप ऐसा कर रहे है तो अभी आप हिंसा के मार्ग पर ही चल रहे है .
इसलिए जब आप यह विश्वास पक्का करले की आप की आँखों में भी भगवान ही विराजमान है तो फिर जब आप इन आँखों से किसी दृश्य या किसी जीव को देखेंगे तो उसमे भी आप को ‘भगवान को ही देखने का’ अभ्यास के माध्यम से विश्वास करना बहुत जरुरी है .
इसलिए जब आप ‘स्वरुप दर्शन का अभ्यास आँखों के माध्यम से ‘ करते है तो आप अपनी आँखों से वे दृश्य कभी नहीं देखेंगे जिनको देखने से आप की आँखे खराब होने लगे .
अर्थात आप अश्लील दृश्य नहीं देखेंगे , आप मारकाट नहीं देखेंगे , आप किसी को गलत काम करते हुए नहीं देखेंगे .
क्यों की जिन कार्यो को आप की आँखे देखकर असहज मह्सूस कर रही है वास्तविक रूप में उन सभी कार्यो के रूप में खुद परमात्मा अपनी लीला रच रहे है . और आप लगातार देखकर प्रभु की लीला में बाधा पंहुचा रहे है .
इस कारण से आप की आँखों की सुरक्षा के लिए परमात्मा से जो प्रेम के कारण या सहज भाव के कारण जो शक्ति मिलती वह अब अवरुद्ध हो जाती है . और फिर धीरे धीरे आँखों में इस प्राण शक्ति की कमी के कारण अंधापन आने लगता है .
इस प्रकार आज हमने मन से मित्रता को कई उदाहरणों से समझने का प्रयास किया है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

