मेरे प्यारे मित्रों आज हमारे परम पिता ‘मै और आप कौन है ?’ के बारे में समझा रहे है की हम कौन है और हमारा एक दूसरे से क्या रिश्ता है ?.
मै तो मेरे प्यारे प्रभु का बच्चा हूँ और मेरे प्रभु ही मेरे इस शरीर और मन के माध्यम से हर क्षण अपनी लीला का आनंद ले रहे है .
और मेरी नज़र में आप भी वही हो जो मै हूँ . पर यदि आप खुद को मेरे से अलग और कम या ज्यादा महान समझते है तो यह आप की खुद की स्वतंत्रता है .
मेरे हिसाब से आप मेरे सच्चे मित्र है और मेरे और आप के असली पिता एक ही है परमपिता .
आप अपनी जगह अपनी दृष्टि के हिसाब से शत प्रतिशत सही हो और मै मेरी जगह शत प्रतिशत सही हूँ .
जब हम दोनों अपनी अपनी जगह शत प्रतिशत सही है तो फिर हमारे बीच में कभी कभी झगड़ा या मन मुटाव क्यों होता है ?
क्यों की हम दोनों केवल अपनी अपनी जगहों पर ही सही है . एक दूसरे की जगहों पर हम कभी सही होते है और कभी गलत .
और ऐसा हमारे अपने अपने मनो के कारण होता है .
हमारे चार प्रकार के मन होते है :
- खुद का मन
- आप का और मेरा साझा मन
- आप का और मेरा और इस पुरे संसार का साझा मन
- सभी लोको का सर्वव्यापी मन
और उपरोक्त सभी मन आपस में ऐसे जुड़े हुए है जैसे गुलाब से खुशबु .
क्यों की सभी मन परमात्मा से ही प्रकट हो रहे है . इसलिए इन सभी मनो ने परमात्मा के गुणों को धारण कर रखा है .
खुद का मन कैसे काम करता है ?
परमात्मा ऐसा गुण रखते है की यदि उन्हें मुझे और आप को लड़ाना है तो यदि आप को एक ही वस्तु कुर्सी दिखाई दे रही है और मुझे यही वस्तु गिलास दिखाए दे रही है .
तो अब यदि हम परमात्मिक अनुभूति में नहीं जी रहे है तो इस बात को लेकर झगड़ा करने लगेंगे की मै तो यह कहूंगा की यह गिलास है और आप कहेंगे की यह कुर्सी है .
और जब आप मेरी बात को नहीं मानेंगे तो मै भी आप की बात को नहीं मानूंगा . और इसलिए हम दोनों में एक दूसरे के प्रति क्रोध भाव का जन्म होने लगेगा .
और फिर इस क्रोध भाव के कारण हम एक दूसरे से झगड़ने लगेंगे . और फिर हमारा झगड़ा देखकर आस पास के लोग एकत्रित होने लग जायेंगे . फिर यही लोग हमे समझा बुझा के शांत कर देंगे .
और इस प्रकार से हमारे प्रभु का मनोरंजन पूरा हो जायेगा . और प्रभु हमारे दोनों के मनो में ‘वो समझता क्यों नहीं है’ का बीज डाल देंगे .
फिर धीरे धीरे हम दोनों इस बीज का लालन पालन करना शुरू कर देंगे . और मजे की बात तो यह है की इन बीजों के पालन पोषण में हम जिन्हे अपना हितेषी समझते है वे हमारा भरपूर सहयोग करते है .
ताकि प्रभु के मनोरंजन में किसी प्रकार की कोई कमी ना रहे .
यह तो हुयी हमारे खुद के मनो की बात .
अब बात करते है की …..
आप का और मेरा साझा मन कैसे काम करता है ?
इस साझे मन की सहायता से ही हमारे रिश्तों का जन्म होता है . अर्थात कौन किसका बेटा बनेगा , कौन किसकी पत्नी बनेगी , कौन मेरा मित्र बनेगा और कौन मेरा शत्रु बनेगा .
यदि हम इस साझा मन को समझ जाए तो फिर इसी मन की सहायता से हम एक दूसरे से सुलझते हुए जुड़ने लगेंगे .
जैसे मेरा और मेरी पत्नी का साझा मन यदि हम दोनों ने सही से समझ लिया है तो फिर यदि आज पत्नी कहती है की मै आज आप के लिए चाय नहीं बनाउंगी .
तो इस स्थिति में मै यह कहूंगा की कोई बात नहीं चलो में बना लेता हूँ . और पत्नी से भी यह पुछूंगा की क्या आप भी चाय पियेंगे?
और इस प्रकार से हम चाय के माध्यम से एक दूसरे से जुड़ेंगे . यदि हम एक दूसरे के लिए चाय नहीं बनायेंगे और मै ही हमेशा आप के लिए चाय क्यों बनाऊ इस भाव को नासमझी के कारण जाग्रत कर लेते है तो फिर हम अपनी अपनी चाय बना कर और एक दूसरे से दूर जाकर चाय पिने लगेंगे . और इसी अलगाव की आदत को हम धीरे धीरे विकसित करने लगते है . जिसका परिणाम हम सब आज इस संसार में देख रहे है .
ऐसी अलगाववादी आदतों से हमारा साझा मन धीरे धीरे समाप्त होने लगता है और फिर धीरे धीरे हम अकेलेपन में जीने लगते है . और बाद में इसी अकेलेपन से मुक्ति के लिए हम मोबाइल , इंटरनेट , टीवी या अन्य प्रकार के संसाधनों का अत्यधिक प्रयोग करने लगते है . जिसका अंतिम परिणाम चिंता , अवसाद , भय , निंदा , घृणा जैसे अनेक भावों का जन्म होना होता है .
साझा मन की कार्यप्रणाली को मै स्वरुप दर्शन के अभ्यास के इन पवित्र लेखों में और गहराई से समझाऊंगा .
चलिए अब आगे चलते है ….
आप का और मेरा और इस पुरे संसार का साझा मन कैसे काम करता है ?
पुरे संसार में फैला हुआ मन . इस मन की सहायता से ही हम किसी अन्य देश में हो रही घटनाओं से प्रभावित होते है .
जैसे रात को हमारे को स्वप्न आया की किसी जगह पर हज़ारो की तादात में साधु संत एकत्रित हुए है .
और फिर सुबह हम टीवी या अखबार में खबर पड़ते है की जैसे अमेरिका में एक भव्य मंदिर का उद्घाटन वहाँ के राष्ट्रपति और साधु संतो ने मिलकर किया है .
इसी प्रकार से इसी मन की सहायता से हमे देश विदेश में होने वाली आगंतुक घटनाओं के बारे में पता चलता है .
इस पुरे संसार में व्याप्त मन (अर्थात मेरा , आप का और इसी धरती पर जैसे किसी विदेशी तीनों का साझा मन) को मै और विस्तार से स्वरुप दर्शन के अभ्यास के आगे के लेखों में विस्तार से समझाऊंगा .
अब बात करते है अंतिम मन की अर्थात चौथे मन की ….
सभी लोको का सर्वव्यापी मन कैसे काम करता है ?
इस मन की सहायता से हम सतयुग , त्रेतायुग , द्वापर युग और कलयुग को लेकर बाते करते है . हम जाती , धर्म और सम्प्रदाय को लेकर झगड़ते है .
इसी मन की सहायता से हम काल चक्र में फसे रहते है .
यही वह मन है जिसकी सहायता से हम बचपन में कहते थे की बेटा तू यदि तेरी बहन या किसी कन्या को पिटेगा तो तेरे हाथो में छोटी छोटी लड़कियाँ उगने लग जायेगी.
और इसी मन की सहायता से हम पूर्व जन्म या अगले जन्म जैसे विषयों को लेकर तरह तरह के तर्क वितर्क करते है . इसी मन की सहायता से हम रामायण , महाभारत की बाते करते है . प्रभु हमारे को मन की कार्यप्रणाली को सही से समझाने के लिए इस प्रकार से मन को चार भागों में बाँटकर वर्गीकरण कर रहे है .
हालांकि मन को समझना एक अनंतता का विषय है . मन ही सबकुछ है और मन जैसा कुछ होता ही नहीं है . ये दोनों बाते शत प्रतिशत सही है .
यदि आप प्रभु से जुड़ने की लगन लगाने वाली इच्छा को जाग्रत कर लेते है तो फिर आप धीरे धीरे इन सभी मनो को समझने में कामयाब होने लगेंगे .
पर जब आप खुद के स्वरुप का दर्शन कर लेते है तो आप को पता चल जाता है की केवल परमात्मा का अस्तित्व है . केवल प्रेम का अस्तित्व है . समय , दूरी और द्रव्यमान यह तीनों ही माया है .
और फिर इस अवस्था में आने के बाद आप हर पल हर परिस्थिति में खुश रहने लगते है .
अब आप यही सोच रहे है की आप कौन है ?
इसके लिए आप पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ स्वरुप दर्शन के इन लेखों को पढ़कर और लिखकर आत्मशात करने का अभ्यास करे . आप देखेंगे की आप धीरे धीरे खुद को पहचानने लग गए है .
धन्यवाद जी . मंगल हो जी .

