सोचना बंद कैसे करे इसका स्थायी इलाज खुद को स्वीकार करना है . दोस्त हमारी हर पल की गतिविधि प्रभु से नियंत्रित है . इसलिए हर प्रकार के अहसास को ‘प्रभु का अहसास ‘ स्वीकार नहीं करने के कारण हमारा सोचना बंद नहीं होता है .
इसलिए इस लेख में मै जो यह ‘मै’ शब्द प्रयुक्त कर रहा हूँ यह केवल प्रभु के साकार रूप को मेरे मित्रों को समझाने का एक तरीका मात्र है.
और जो मै यहां ‘सोचना’ शब्द प्रयुक्त कर रहा हूँ वह भी केवल प्रभु के साकार रूप को समझाने का एक तरीका मात्र है .
आइये समझते है की कैसे
सोचना बंद कैसे करे

- जैसे ही आप कुछ भी सोचते है आप के मन का रूप बदल जाता है
- और फिर मन के रूप के बदलते ही शरीर का रूप भी बदल जाता है
- और शरीर के रूप के बदलने के कारण ही आपको शरीर में कई प्रकार के परिवर्तनों का अहसास होता है
- ये अहसास हो सकते है जैसे नया विचार आना , गर्दन में कुछ दर्द के जैसा ,
- पेट में गैस का अहसास , हाथ पैरो में हल्कापन या भारीपन का अहसास होना ,
- चक्कर आना , कमजोरी महसूस होना , डर लगना ऐसे अनेक प्रकार के परिवर्तन
- जब आप इन परिवर्तनों को ‘प्रभु का अहसास ‘ के अलावा कुछ भी संज्ञा देते है तो
- आप एक बंधन बांध लेते है . क्यों की जब भी आप कोई काम करने के लिए उठते है तो आप के
- इस शरीर में कई प्रकार के परिवर्तन होते है . और इसमें प्राण शक्ति खर्च होती है यदि आप सोचते है तो
- जबसे हमारी आत्मा इस शरीर रूप में बंधी है तब से हम लगातार सोचे जा रहे है
- और इसीलिए हम निरंतर नये बंधन बांधते जा रहे है
- अर्थात हमारा सोचना ही बंधन है
अब आप पूछेंगे की
सोचना बंद कर देंगे तो फिर काम कैसे करेंगे ?
- इसके लिए आप को क्रियायोग ध्यान का अभ्यास करना चाहिए
- अब मै सोचना ही बंधन है को क्रियायोग ध्यान के अभ्यास से समझाने जा रहा हूँ
- क्रियायोग ध्यान का अभ्यास का अर्थ है इस क्षण में जीना
- अर्थात जब आप इस क्षण में जीने का अभ्यास करते है तो आप को अनुभव होता है की
- सब कुछ अपने आप हो रहा है . आप की आत्मा एक पेड़ की तरह मनुष्य रुपी वृक्ष का रूप ले रही है
- जैसे हम एक आम की घुटली जमीन में गाड़ते है और इसकी सेवा करते है तो यह घुटली आम के
- पेड़ में बदलने लगती है
- अर्थात अब आम की घुटली सहज रूप से वृक्ष में रूपांतरित हो रही है
- अब यदि हम इस आम के पेड़ के जीवन चक्र के दौरान रोज इसकी टहनियों को काटेंगे यह सोच
- कर की इस पेड़ की अमुक टहनी मुझे सूंदर नहीं लग रही है तो क्या आम का पेड़ बचेगा ?
- कभी नहीं . क्यों की हमे पेड़ के माध्यम से परमात्मा यह सीखा रहे है की आप को पेड़ो की सेवा करने
- का अधिकार ही है . पेड़ो के साथ हिंसा करने का अधिकार नहीं है
इसलिए अब हम हिंसा का सही रूप समझते है
- हमारा प्रकृति के विरुद्ध सोचना ही हिंसा है . अर्थात हम वाणी से , आँखों से , स्पर्श से या भावों के
- या कर्मों के माध्यम से प्रकृति की किसी भी रचना को विकृत करते है तो इसका मतलब हम
- हिंसा करते है . और ऐसे हिंसात्मक कर्मों के लिए हमे सोचना पड़ता है . इसे आप खुद के ऊपर
- लेकर समझे . जैसे यदि आप का हाथ किसी को बहुत पसंद आ जाए और वह अब आप के हाथ को
- काटकर ले जाने की कोशिश करे तो आप क्या करेंगे ?. अवश्य ही आप को क्रोध आयेगा,
- आप इसका विरोध करेंगे . क्यों की आप का यह हाथ आप के इस शरीर रचना का अभिन्न अंग है
- इसलिए प्रकृति चाहती है की यह हाथ इस रचना के साथ प्राकृतिक रूप से विकसित होता रहे
- अर्थात आप के हाथ को भी अपना जीवन चक्र पूरा करने का अधिकार प्रकति ने दिया है
- ठीक इसी प्रकार से यदि आप को पेड़ के लगा गुलाब का फूल पसंद आ जाता है तो इसका
- मतलब यह नहीं है की आप इस फूल को तोड़कर अपने साथ लेकर चल दे . बल्कि हमे यह
- समझना चाहिए की पेड़ के साथ ही गुलाब की सुंदरता को निहारे . इस प्रकार से किसी
- भी रचना के साथ अपना प्रेम सम्बन्ध रखना ही सत्य और अहिंसा का मार्ग होता है
हालांकि ‘सोचना बंद कैसे करे’ इसे उदाहरण से समझे
- जैसे आप को भूख लगी तो यह ‘भूख क्यों लगी’ सोचना ही बंधन है और
- यह सोचना की ‘अब भोजन का प्रबंध हो जाये तो ठीक रहेगा’ बंधन नहीं है
- क्यों की हमारा शरीर परमात्मा से नियंत्रित है और भूख प्यास लगना यह सब
- प्राकृतिक क्रियाये है . ठीक इसी प्रकार किसी ने आप से कहा भैया मुझे प्यास लगी है
- मुझे पानी पिला दो . अब आप का ‘पानी मै क्यों पिलाऊ जबकि आप के पास पानी भी रखा हुआ है और
- आप पानी पिलाने में समर्थ भी है’ सोचना ही बंधन है
- इसकी जगह आप का यह सोचना की ‘चलो मेरे मित्रों को पानी पिलाने का काम करते है ‘
- बंधन नहीं है
- अर्थात प्रकृति के साथ बहने के लिए सोचना बंधन नहीं है बल्कि प्रभु से जुड़ने का अभ्यास है
- हम प्रभु का नाम जप रहे है और मन में यह शंका है की क्या पता प्रभु मिलेंगे या नहीं तो ऐसा सोचना ही बंधन है
सच तो यह है की प्रभु तो खुद आप के रूप में ही प्रकट हो रहे है फिर मन में विश्वास क्यों नहीं होता है ?
उत्तर : प्रकृति के तीन गुणों के कारण.
आइये समझते है ये तीनों गुण कैसे हमे बांधते है

- ये तीन गुण है : सतो गुण , रजो गुण और तमो गुण
- सतो गुण हमें सबसे कम बांधता है
- रजो गुण हमें सतो गुण से ज्यादा बांधता है
- और तमो गुण हमें सबसे ज्यादा बांधता है
- सतो गुण का अर्थ है की प्रकृति का ऐसा गुण जो जीवों को सच्चे प्राकृतिक प्रेम में बांधकर रखता है
- जैसे एक माँ अपने बच्चे से इसलिए प्रेम करती है की उसने नो माह तक इस बच्चे को पाने के
- लिए बहुत पीड़ा झेली है . इसलिए यह माँ इस बच्चे को जीवन में आगे बढ़ते हुए देखना चाहती है
- रजो गुण का अर्थ है की हमारे भीतर राजा की तरह जीवन जीने के भाव विकसित होते हो
- और जब हम राज करने की सोचते है तो खुद पर राज करते करते औरो पर भी राज करने लगते है
- अब यह जरुरी नहीं है की हर किसी को हमारा राज पसंद आये . इसलिए जो कोई भी हमारे राज का
- विरोध करेगा हम उसका विरोध करेंगे . इसलिए हमारा इस प्रकार से विरोध करना ही बंधन पैदा
- करता है . क्यों की बिना विरोध के हम राज नहीं कर पायेंगे और विरोध के लिए हमे मन को
- अशांत करना पड़ेगा . इसलिए राजा लोग अशांत ही रहते है
तमो गुण का सम्बन्ध ‘सोचना बंद कैसे करे’ प्रश्न से
- तमो गुण का अर्थ है की हमारे भीतर बहुत ही निम्न स्तर का जीवन जीने के भाव विकसित होते हो
- अर्थात हम एक पशु की तरह या ऐसे नीच कर्म करने लगते है जिससे हम खुद ही हमारा विनाश
- करने लगते है . इस तमो गुण के प्रभाव के कारण हम हमेशा तमगा मार के भागते है . अन्य जीवों को सताते है ,
- बात बात पर मार काट पर उतारू हो जाते है . क्यों की तमो गुण के कारण हमारा स्वभाव
- ऐसा हो जाता है की जीवों को मारकर खाना हमारा शोक बन जाता है . और इस तमो गुण के प्रभाव से
- हम इस कदर बंध जाते है की हम चाहकर भी अपनी चेतना को ऊपर नहीं उठा पाते है
क्रियायोग ध्यान का अभ्यास हमे इन तीनों गुणों से मुक्त करके प्रभु का अहसास कराता है .


